शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

... ताकि कम हो सके थाली से जहर


निडाना के अलावा जिले के अन्य गांवों के किसानों ने भी कीटनाशक रहित खेती की तरफ बढ़ाए कदम

नरेंद्र कुंडू
जींद। जिला मुख्यालय से चंद किलोमीटर की दूरी पर स्थित निडाना गांव की धरती से 4 साल पहले उठी कीट ज्ञान की चिंगारी अब क्रांति का रूप लेने लगी है। इस क्रांति का प्रभाव जिले के अन्य गांवों में भी देखने को मिल रहा है। निडाना की किसान खेत पाठशाला से कीट ज्ञान हासिल कर जिले के कई गांवों के किसान अब निडाना गांव के किसानों की तर्ज पर कीटनाशक रहित खेती की राह पकड़ चुके हैं और इससे किसानों को सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। किसान बिना किसी पेस्टीसाइड का प्रयोग किए फसल का अच्छा उत्पादन ले रहे हैं। मुहिम को मिल रहे अच्छे रिस्पांश से एक बात साफ हो रही है कि लोगों की थाली से जहर कम करने के लिए निडाना के किसानों द्वारा शुरू की गई इस मुहिम का रंग अब जिले के अन्य किसानों पर भी चढऩे लगा है। अब यह किसान अपने-अपने क्षेत्र के किसानों के लिए रोल मॉडल बनकर उभरेंगे और दूसरे किसानों को भी कीटनाशक रहित खेती के लिए प्रेरित करेंगे। 
अलेवा गांव के प्रगतिशील किसान जोगेंद्र ने बताया कि उसने एम.ए. तक पढ़ाई की है तथा एम.ए. के अलावा भिन्न-भिन्न कोर्स के 17 डिप्लोमे भी किए हुए है। जोगेंद्र ने बताया कि वह 1988 से कृषि के क्षेत्र से जुड़ा हुआ है तथा वह अपने खेती-बाड़ी का पूरा लेखाजोखा रखता है। जोगेंद्र ने बतया कि पहले जब उसका परिवार सामूहिक था तो वे 28 एकड़ की खेती करते थे लेकिन अब 2 वर्षों से जमीन का बटवारा हो चुका है और वह अब सिर्फ 5 एकड़ की ही खेती करता है। जोगेंद्र ने खेतीबाड़ी का अपना लेखाजोखा दिखाते हुए बताया कि 1988 से लेकर अब तक उसके परिवार द्वारा पेस्टीसाइड पर खर्च लगभग 74 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं। जोगेंद्र ने बताया कि उसने निडाना गांव में किसान खेत पाठशाला से जुड़कर कीट ज्ञान हासिल किया और अब उसे 32 कीटों की पहचान है। निडाना के किसानों से प्रभावित होकर इस वर्ष उसने बिना कीटनाशक खेती की है और उसके उत्पादन में कोई कमी नहीं हुई है। 
वरिष्ठ पशु चिकित्सक राजबीर चहल ने बताया कि वह नौकरी के साथ-साथ 30 एकड़ में खेती करता है। इस बार उसने 30 एकड़ में धान की फसल लगाई हुई है। चहल ने बताया कि पेस्टीसाइड पर हर वर्ष उसका एक लाख रुपए खर्च हो जाते थे लेकिन इस वर्ष उसने 25 एकड़ में एक छटांक भी पेस्टीसाइड का प्रयोग नहीं किया है। इस बार उसने सिर्फ ङ्क्षजक, यूरिया व डी.ए.पी. के मिश्रण का घोल तैयार कर छिड़काव किया है और उत्पादन भी अन्य किसानों के बराबर है। चहल ने कहा कि अगले वर्ष वह अन्य किसानों को भी कीटनाशक रहित खेती के लिए प्रेरित करेंगे। 
राजपुरा भैण निवासी बलवान ने बताया कि वह ढाई एकड़ में कपास की खेती करता है और इसमें उसे हर वर्ष 5 हजार रुपए का खर्च आता था। बलवान ने बताया कि अकेले उसके गांव में हर वर्ष 3 करोड़ रुपए के कीटनाशकों का प्रयोग होता है। वह पिछले 4 वर्षों से किसान खेत पाठशाला से जुड़ा हुआ था लेकिन वह बिना पेस्टीसाइड की खेती के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाता था। इस बार उसने अपनी ढाई एकड़ की फसल में एक बूंद भी कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया है। 
फरमाना निवासी संजय ने बताया कि उसने पहली बार कपास की खेती की है। मोर पंजे के कारण उसकी एक एकड़ की फसल खराब हो गई थी लेकिन उसने ङ्क्षजक, यूरिया व डी.ए.पी. का घोल तैयार कर 4 बार इसका छिड़काव किया। इस बार उसकी कपास की फसल में प्रति पौधा 60 से 80 ङ्क्षटड्डे आए, जिनसे उसने 4 बार कपास की चुगवाई कर ली है और कम से कम एक बार ओर कपास की चुगवाई की जानी है।
किसानों के साथ अपने अनुभव सांझा करते वरिष्ठ पशु चिकित्सक।
निडाना निवासी सुरेश तथा लाखनमाजरा निवासी नारायण ने बताया कि अमरूद का बाग है। पहले फलों को फ्रूट फ्लाई व अन्य बीमारियों से बचाने के लिए वे कीटनाशकों का प्रयोग करते थे। इससे फल का टेस्ट भी बदल जाता और फल की गुणवता में भी कमी आती थी। सुरेश व नारायण ने बताया कि अब वह फलों पर किसी भी प्रकार के कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करते हैं और बिना कीटनाशकों का प्रयोग किए अच्छा उत्पादन ले रहे हैं। कीटों की पहचान होने के कारण अब उन्हें कीटों व बीमारी के बीच का अंतर पता चल गया है। इसके अलावा खरक रामजी निवासी रोशन, ईंटल कलां निवासी चत्तर ङ्क्षसह तथा रधाना निवासी जगङ्क्षमद्र ङ्क्षसह भी इन किसानों की तरफ बिना पेस्टीसाइड के अच्छा उत्पादन लिया है। 



मिलावटखोरों के सामने बौना साबित हो रहा फूड सेफ्टी विभाग


पिछले वर्ष लिए गए सैंपलों पर अभी तक नहीं हुई कार्रवाई

नरेंद्र कुंडू
जींद।  त्यौहारी सीजन के दौरान मिलावटखोरों पर नकेल कसने में फूड सेफ्टी विभाग भी बेबस नजर आ रहा है। नई मिलावटी मिठाई बाजार में आ चुकी है लेकिन विभाग अभी तक पिछले वर्ष मिलावटी मिठाई बेचकर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पाया है। पिछले वर्ष दीपावली के अवसर पर विभाग द्वारा लगभग 65 सैंपल लिए गए थे। इनमें से अब तक सिर्फ 50 के लगभग सैंपलों की रिपोर्ट ही विभाग के पास पहुंची है, जिनमें से भी सिर्फ 5 ही सैंपल संदेह के घेरे में आए हैं लेकिन विभाग अभी तक इनके खिलाफ भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाया है। एक वर्ष की लंबी अवधि बीत जाने के बाद भी अभी तक इन पांचों सैंपलों का केस अतिरिक्त उपायुक्त के पास ही विचाराधीन हैं। इस प्रकार जांच प्रक्रिया लंबी व धीमी होने के कारण विभाग मिलावटखोरों के सामने बौना साबित हो रहा है। 

त्यौहारी सीजन के दौरान मिलावटखोरी को रोकने के लिए फूड सेफ्टी विभाग हर वर्ष विशेष अभियान चलाता है। इस अभियान के तहत मिठाइयों की दुकानों से सैंपल भी लिए जाते हैं और इन्हें जांच के लिए लैब में भी भेजा जाता है लेकिन इसके बाद क्या होता है किसी को कुछ भी पता नहीं होता। लैब से रिपोर्ट आने में महीनों बीत जाते हैं। अगर लैब से रिपोर्ट आ भी जाती है तो सैंपल फेल होने वाले दुकानदारों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हो पाती। फूड सेफ्टी विभाग से मिले आंकड़ों से यह बात साफ हो रही है। विभाग दीपावली पर मिलावटखोरी को रोकने के लिए नए सैंपल लेने में जुटा है लेकिन पिछले वर्ष लिए गए सैंपलों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। विभाग द्वारा पिछले वर्ष मिठाइयों के 65 के लगभग सैंपल लिए गए थे, जिनमें से अभी तक विभाग के पास लगभग 50 ही सैंपलों की रिपोर्ट पहुंची है। इसमें से सिर्फ 5 ही सैंपल संदेह के घेरे में आए हैं लेकिन अभी तक इनके खिलाफ भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है। संदेह के घेरे में आने वाले इन पांचों दुकानदारों के खिलाफ विभाग द्वारा केस तो तैयार कर दिया गया लेकिन अभी तक यह केस अतिरिक्त उपायुक्त की टेबल से आगे नहीं बढ़ पाया है। बाजारा नई मिलावटी मिठाइयों से अटा पड़ा है लेकिन विभाग अभी तक पिछले वर्ष मिलावटी मिठाइयां बेचने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पाया है। एक वर्ष की लंबी अवधि बीत जाने के बावजूद अभी तक मिलावटखोरों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि मिलावटखोरों पर नकेल डालने के लिए प्रशासन कितना सक्रिय है। जांच की इस लंबी व धीमी प्रक्रिया के कारण मिलावटखोरों के जहन से विभागीय अधिकारियों का खौफ निकल जाता है।

बिना लाइसैंस के ही चल रही हैं मिठाई की दुकानें 

मिलावटी खाद्य पदार्थों को रोकने के लिए फूड सेफ्टी एक्ट के तहत विभाग ने पंजीकरण सिस्टम शुरू किया हुआ है। इसके तहत दुकानदारों को विभाग की वेबसाइट पर अपना पंजीकरण करवाकर लाइसैंस लेना होता है लेकिन विभागीय अधिकारियों के अनुसार अभी तक शहर में एक भी मिठाई विक्रेता ने लाइसैंस नहीं लिया है। शहर में बिना लाइसैंस के ही मिठाई की दुकानें चल रही हैं और खुलेआम मीठा जहर बिक रहा है। जिला प्रशासन की नाक के नीचे ही बिना लाइसैंस के मिठाई की दुकानें चलने से यह बात साफ हो जाती है कि जिला प्रशासन व विभाग मिलावटखोरी को रोकने के लिए कितना सजग है।

रिपोर्ट के आधार पर होती है कार्रवाई

इस बारे में फूड सेफ्टी विभाग के इंस्पैक्टर एन.डी. शर्मा से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि सैंपल लेने के बाद जांच के लिए लैब में भेज दिए जाते हैं। लैब से रिपोर्ट आने में समय लगता है। रिपोर्ट के आधार पर ही विभाग आगे कार्रवाई करता है। पिछले वर्ष 65 सैंपल लिए गए थे, जिनमें से 50 के लगभग सैंपलों की रिपोर्ट आ चुकी है। इसमें से 5 सैंपलों की रिपोर्ट सही नहीं है। इन पांचों सैंपलों का केस तैयार कर कार्रवाई के लिए ए.डी.सी. को सौंपा गया है। पंजीकरण करवाकर लाइसैंस लेने के लिए विभाग द्वारा समय-समय पर दुकानदारों को जागरूक किया जाता है।  



मंगलवार, 6 नवंबर 2012

अनाज मंडी की सड़कों पर खराब हो रहा धरती पुत्रों का पीला सोना


धान का सीजन शुरू होते ही खुली जिला प्रशासन व खरीद एजैंसियों के दावों की पोल

पिछले 10 दिनों से बंद है पी.आर. धान का खरीद कार्य

नरेंद्र कुंडू
जींद। जिला प्रशासन व सरकारी खरीद एजैंसियों द्वारा अनाज मंडी में धान की सभी किस्मों की खरीद व उठान कार्य को तीव्रता से करने के सभी दावे खोखले साबित हो रहे हैं। सीजन शुरू होते ही जिला प्रशासन व खरीद एजैंसियों के दावों की पोल खुलनी शुरू हो गई है। शहर की रोहतक रोड स्थित नई अनाज मंडी में लगभग पिछले 10 दिनों से पी.आर. धान की खरीद नहीं हो रही है। खरीद एजैंसियों की लापरवाही के कारण धरतीपुत्रों का पीला सोना अनाज मंडी की सड़कों पर ही खराब हो रहा है। समय पर पी.आर. धान की खरीद नहीं होने के कारण अनाज मंडी में धान के ढेर लगे हुए हैं। फिल्हाल नई अनाज मंडी में लगभग 5 हजार क्विंटल पी.आर. धान बिक्री के लिए पड़ी हुई है लेकिन खरीद एजैंसियां धान की खरीद के लिए आगे नहीं आ रही हैं। खरीद एजैंसियां बारदाने की कमी बताकर खरीद कार्य से अपने हाथ पीछे खींच रही है। 
 फसल की खरीद नहीं होने पर नारेबाजी कर विरोध जताते किसान।
धान की फसल का सीजन जोरों पर है और जिला प्रशासन व सरकारी खरीद एजैंसियां धान की खरीद व उठान कार्य के पुख्ता इंतजाम का दम भर रहे हैं लेकिन वास्तविकता ही कुछ ओर है। अनाज मंडी में लगभग पिछले 10 दिनों से पी.आर. धान की खरीद नहीं हो रही है। जबकि पी.आर. धान की खरीद की जिम्मेदारी सरकारी खरीद एजैंसियों की होती है लेकिन यहां की अनाज मंडी में जिला प्रशासन व सरकारी खरीद एजैंसियों के धान की फसल के खरीद के सभी दावे खोखले साबित हो रहे हैं। समय  पर पी.आर. धान की खरीद नहीं होने के कारण किसानों को मंडी में ही डेरा डालना पड़ रहा है। खरीद एजैंसियों की लापरवाही के कारण किसानों का पीला सोना अनाज मंडी की सड़कों पर ही खराब हो रहा है। 

क्या कहते हैं किसान

पी.आर. धान को दिखाते हुए किसान।

अनाज मंडी  में धान की फसल लेकर आए गांव लजवाना खुर्द के किसान प्रदीप अहलावत व सोनू ने बताया कि उसकी फसल पिछले 10 दिनों से अनाज मंडी में पड़ी हुई है लेकिन खरीद एजैंसियां फसल में नमी का बहाना बनाकर फसल की खरीद से मना कर रहे हैं, जबकि उसकी फसल पूरी तरह से नमी रहित है। गांव कैरखेड़ी से आए किसान जगबीर ने बताया  कि वह एक सप्ताह से अपनी फसल की बिक्री के लिए अनाज मंडी में ही डटा हुआ है लेकिन एक सप्ताह बाद भी खरीद एजैंसियों द्वारा उसकी फसल की खरीद नहीं की गई है। गांव पेटवाड़ से आए किसान रोहताश, अजमेर, गांव खांडाखेड़ी से आए किसान बलवान, गांव लोहचब से आए किसान सतबीर, नगूरां गांव से आए किसान मनोज जोरड़ा ने बताया कि वे पिछले एक सप्ताह से अपनी पी.आर. धान की बिक्री के लिए 
 मंडी में फसल लेकर आए किसान जिनसे बात की गई। 
अनाज मंडी में ही डेरा डाले हुए हैं लेकिन खरीद एजैंसियां धान की खरीद नहीं कर रही हैं। समय पर फसल की खरीद नहीं होने के कारण उनका धान की कटाई व गेहूं की बिजाई के कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। इससे उन्हें आॢथक व मानसिक परेशानियों का समाना करना पड़ रहा है। 

पर्याप्त मात्रा में बारदाना उपलब्ध नहीं करवा रही हैं खरीद एजैंसियां

अनाज मंडिय़ों के कुछ आढ़तियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि खरीद एजैंसियां उन्हें पर्याप्त मात्रा में बारदाना उपलब्ध नहीं करवा रही हैं। बारदाना नहीं मिलने के कारण धान का उठान कार्य भी प्रभावित हो रहा है। आढ़तियों ने बताया कि फिल्हाल अनाज मंडी में अकेले पी.आर. धान का लगभग 5 हजार क्विंटल का स्टोक बिक्री के लिए पड़ा हुआ है। समय पर फसल की खरीद व उठान नहीं होने के कारण अनाज मंडी में पी.आर. धान के ढेर लग गए हैं और किसानों को फसल डालने के लिए पर्याप्त मात्रा में जगह उपलब्ध नहीं हो पा रही है।  

बेलगाम हैं अधिकारी

कांग्रेस सरकार के शासनकाल में अधिकारी बेलगाम हैं। अधिकारियों की लापरवाही के कारण समय पर  फसलों की खरीद नहीं हो रही है। इससे किसानों का सारा समय अनाज मंडी में ही खराब हो रहा है। किसानों को फसल का सही मूल्य नहीं मिल रहा है। जबकि इनैलो के शासनकाल में किसानों को फसल  के अच्छे भाव मिलते थे और मंडी में पहुंचते ही किसान की फसल खरीद ली जाती थी। 
सुनील कंडेला
पूर्व प्रदेश महासचिव, युवा इनैलो
समय पर की जा रही है धान की खरीद
हैफेड द्वारा समय पर धान की खरीद की जा रही है। पी.आर. धान की खरीद के लिए हैफेड के अलावा एग्रो व एफ.सी.आई. के लिए अलग-अलग दिन निर्धारित किए गए हैं। हैफेड के पास बारदाने की कोई कमी नहीं है। आढ़तियों को समय पर पर्याप्त मात्रा में बारदाना उपलब्ध करवाया जा रहा है। फसल में निर्धारित मात्रा से ज्यादा नमी के कारण फसल का खरीद कार्य प्रभावित हो रहा है। 
लक्ष्मीनारायण, डी.एम. 
हैफेड








अब मैडीकल स्टोर के लाइसैंस के लिए नहीं काटने पड़ेंगे सरकारी कार्यालय के चक्कर


ऑन लाइन ही होगी लाइसैंस की सारी प्रक्रिया

नरेंद्र कुंडू
जींद। मैडीकल स्टोर के लिए लाइसैंस लेने वाले आवेदकों के लिए एक अच्छी खबर है। अब आवेदकों को मैडीकल स्टोर के लिए लाइसैंस लेने के लिए फूड एंड ड्रग सेफ्टी विभाग (एफ.डी.ए.) के कार्यलय के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। इसके लिए फूड एंड ड्रग सेफ्टी विभाग ने ऑन लाइन प्रक्रिया शुरू कर दी है। विभाग द्वारा शुरू की गई इस योजना की खास बात यह है कि विभाग आवेदक को एस.एम.एस. के जरिये उसकी फाइल की स्टेट्स रिपोर्ट देगा।
पहले फूड एंड ड्रग सेफ्टी विभाग द्वारा मैडीकल स्टोर का लाइसैंस देने की काफी लंबी व जटिल प्रक्रिया थी। लाइसैंस लेने के लिए आवेदकों को कई-कई दिनों तक विभाग के कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते थे। इस प्रक्रिया के दौरान विभाग के कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों तक की जेब भी गर्म करनी पड़ती थी तब जाकर कहीं आवेदक को लाइसैंस मिलता था लेकिन विभाग ने अब इस पुरानी प्रक्रिया को बंद कर यह सब प्रक्रिया ऑन लाइन कर दी है। अब विभाग ने मैडीकल स्टोर के लिए लाइसैंस देने की प्रक्रिया को काफी सरल कर दिया है। अब लाइसैंस लेने की सारी प्रक्रिया ऑन लाइन चलेगी। आवेदक को बस विभाग की वैबसाइट डब्ल्यू.डब्ल्य.डब्ल्य. डॉट एफ.डी.ए. हरियाणा डॉट ओ.आर.जी. पर जाकर फार्म सबमिट करना होगा। इसके बाद फाइल की सारी प्रक्रिया नेट पर ही चलेगी। विभाग द्वारा उठाए गए इस कदम से अब आवेदक को तो समय व पैसे की बचत होगी ही साथ-साथ रिश्वतखोरी के मामलों में भी कमी आएगी।

देश का पहला राज्य बना हरियाणा

विभागीय अधिकारियों की मानें तो हरियाणा मैडीकल स्टोर के लाइसैंस की प्रक्रिया ऑन लाइन शुरू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। अभी तक किसी अन्य प्रदेश में ऑन लाइन मैडीकल स्टोर का लाइसैंस देने की योजना लागू नहीं हो सकी है। इस योजना को लागू कर हरियाणा अन्य प्रदेशों के लिए रोल मॉडल बनकर उभरा है।

एस.एम.एस. के माध्यम से मिलेगी फाइल की जानकारी

मैडीकल स्टोर के लाइसैंस के लिए नैट पर फाइल जमा करवाने के बाद आवेदक को फाइल के स्टेट्स के बारे में जानकारी लेने के लिए भी विभाग के कार्यालय के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। फाइल की स्टेट्स रिपोर्ट आवेदक को एस.एम.एस. के माध्यम से मोबाइल पर ही मिलती रहेगी। इसके अलावा विभाग के अधिकारियों द्वारा किस दिन दुकान का निरीक्षण किया जाएगा इसके बारे में भी आवेदक को मोबाइल के माध्यम से सूचित कर दिया जाएगा।


विभाग द्वारा मैडीकल के लाइसैंस के लिए ऑन लाइन आवेदन की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। विभाग द्वारा यह योजना लागू करने के बाद लाइसैंस बनवाने की प्रक्रिया काफी आसान हो गई है। इस योजना से आवेदकों को काफी राहत मिलेगी और सरकारी कार्यालयों से फाइलों का काम भी कम होगा।
सुरेश चौधरी
जिला औषधिय नियंत्रक, जींद

इलैक्ट्रोनिक आइटमों की मार से फीकी पड़ी दीये की चमक

परम्परा को कायम रखने के लिए अपने पुस्तैनी कारोबार को नहीं छोड़ पा रहे हैं कुंभकार

नरेंद्र कुंडू
जींद। आधुनिकता की चकाचौंध व बाजारों में इलैक्ट्रोनिक आइटमों की भरमार के कारण मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगर (कुम्हार) अपने इस पुस्तैनी कारोबार से मुहं मोडऩे पर विवश हैं। पुर्वजों से विरास्त में मिले इस रोजगार से अब वह अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का भी जुगाड़ नहीं कर पा रहे हैं। केवल परम्परा को कायम रखने के लिए ही कुम्हार अपने इस पुस्तैनी कारोबार को चलाए हुए हैं। कारीगरों को बर्तन बनाने के लिए मिट्टी की व्यवस्था से लेकर बर्तनों की बिक्री तक अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कारीगरों को उनकी मेहतन के अनुसार बर्तनों के पैसे नहीं मिल पाते हैं। गर्मी के सीजन के बाद केवल दीपावली पर एक माह तक ही उनका कारोबार चलता है। इसके बाद उनका यह कारोबारा पूरे वर्ष ठप्प रहता है। शहर में लगभग 20 से 25 कारीगर इस काम से जुड़े हुए हैं। इस एक माह के इस सीजन के दौरान एक कारीगर लगभग एक लाख रुपए तक का कारोबार कर लेता है लेकिन इस एक लाख के कारोबार से एक कारीगर को केवल 10 से 15 हजार रुपए की ही बचत होती है। 

क्यों पड़ती है मिट्टी के दीयों की जरूरत

दीपावली पर पूजा में शुद्धता बनाए रखने के लिए तांबा, पीतल, स्टली व अन्य धातुओं से निॢमत वस्तुओं की बजाए मिट्टी को शुद्ध माना जाता है और शुद्धता से ही पूजा पूर्ण मानी जाती है। इसलिए पूजा के दौरान मिट्टी से निॢमत दीयों की जरूरत पड़ती है। लोगों में पूजा में शुद्धता की आस्था के कारण ही कुम्हारों का कारोबार थोड़ा बहुत चल रहा है। 
मिट्टी से तैयार किए गए नए डिजाइन के दीये।

रोजगार बचाने के लिए मॉडर्न पद्धित का लिया सहारा 

अपने पुस्तैनी कारोबार को आगे बढ़ाने तथा अपने रोजगार को बचाने के लिए कुम्हारों ने भी मॉडर्न पद्धित का सहारा लिया है। लोगों का रूझान मिट्टी से निॢमत बर्तनों की तरफ आकॢषत करने के लिए कारीगरों ने दीयों व अन्य बर्तनों में फैंसी डिजाइन डालकर नया लूक दिया जाता है। इस बार कुम्हारों के पास मिट्टी से निर्मित हटड़ी, फैंसी दीये, स्टैंड वाले दीयों के अलावा साधारण दीये तैयार किए गए हैं। 

खाली जगह की तलाश में खाने पड़ते हैं धक्के

कारीगरों के सामने मिट्टी से बर्तन तैयार करने के बाद बर्तनों को पकाने के लिए जगह की कमी भी आड़े आती 
है। बर्तन तैयार होने के बाद बर्तनों को पकाने के लिए भठ्ठ लगाने के लिए खाली जगह की जरूरत पड़ती है। कारीगर बुद्धराम व राजेंद्र ने बताया कि शहर में खाली जगह उपलब्ध नहीं होने के कारण कारीगरों को खाली जगह की तलाश के लिए भी शहर में इधर-उधर भटकना पड़ता है। खाली जगह मिलने के बाद उसे किराये पर लेकर वहां भठ्ठ लगाया जाता है। 

मिट्टी की कमी आती है आड़े

मिट्टी के दीये व बर्तन बनाने के लिए चिकनी मिट्टी की आवश्यकता होती है। पहले इस तरह की चिकनी मिट्टी गांव के तालाबों में मिल जाती थी, जिस कारण मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों को मिट्टी के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ता था लेकिन अब तालाबों में गंदगी फैलने के कारण चिकनी मिट्टी खत्म हो चुकी है। तालाबों की मिट्टी कीचड़ में तबदील हो गई है। पूरे जिले में सिर्फ कुछ गिने-चुने गांवों जैसे डाहोला, ईक्कस, खटकड़ व निडाना में ही इस तरह की मिट्टी मिलती है। जिस कारण मिट्टी से बर्तन बनाने वाले कारीगरों के सामने मिट्टी की कमी आड़े आ रही है। अब बर्तनों के निर्माण के लिए आस-पास के गांवों से मिट्टी मंगवानी पड़ती है। ग्रामीण क्षेत्र से मिट्टी मंगवाने के लिए कुंभकारों को अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ते हैं। कारीगर विनोद ने बताया कि उन्हें एक मिट्टी ट्राली के लिए 1800 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा मिट्टी के बर्तनों को पकाने के लिए ईंधन भी खरीदना पड़ता है। इस प्रकार उनके इस कारोबार में लागत ज्यादा होने के कारण आमदनी कम है। 
 चाक पर मिट्टी से दीये बनाता कारीगर।



बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

सावधान ! कहीं आकर्षक ऑफर की पेशकस बिगाड़ न दे आपके चेहरे का नूर


त्यौहारी सीजन पर महिलाओं को लुभाने के लिए ब्यूटी पार्लर कर रहे हैं आकर्सक ऑफर्स की पेशकश

नरेंद्र कुंडू 

जींद। विवाह-शादियों का सीजन हो या कोई त्यौहार महिलाओं में सुंदर दिखने की चाहत लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में महिलाएं सजने-संवरने के लिए ब्यूटी पार्लरों का रूख करती हैं। ब्यूटी पार्लर संचालक भी ऐसे अवसरों को भुनाने से पीछे नहीं हटते। ऐसे में वे महिलाओं को लुभाने के लिए आकर्षक ऑफर्स की पेशकस करते हैं। दरअसल करवाचौथ के पर्व में अभी 3 दिन बाकी हैं और महिलाओं को लुभाने के लिए ब्यूटी पार्लर आकर्षक ऑफर्स दे रहे हैं। ऐसे में ब्यूटी पार्लर में सजन-संवरने वाली महिलाओं को सावधान रहने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि आकर्षक पैकेज लेने की चाहत में आपकी प्राकृतिक सुंदरता भी बिगड़ न जाए। कम क्वालिटी का उत्पाद आपके चेहरे का नूर बिगाड़ सकता है। बात रिस्क की करें तो शहर में ऐसे कई पार्लर हैं, जहां चेहरे पर रासायनिक या हर्बल उत्पाद लगाने से पहले जांच नहीं की जाती है। बाद में ग्राहकों को पिंपल्स, एलर्जी व झाइयों जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। ब्यूटी विशेषज्ञ अंजू का कहना है कि चेहरे की त्वचा बहुत संवेदनशील होती है, इसलिए जांच कराए बिना चेहरे पर किसी प्रकार का उत्पाद नहीं लगवाने चाहिएं। चेहरे पर केवल ब्रांडेड रासायनिक या हर्बल उत्पाद का ही प्रयोग करना चाहिए।

स्लीमिंग सेवाओं पर दे रहे हैं 50 प्रतिशत की छूट

त्यौहारों के सीजन को देखते हुए इस बार ब्यूटी संचालक महिलाओं की जेब को देखकर ऑफर दे रहें है। इन पार्लर्स में जहां ब्यूटी व स्लीङ्क्षमग सेवाओं पर 50 प्रतिशत की छूट दी जा रही है, वहीं 999 से 2499 रुपए के पैकेजेस पर मेकअप व मेहंदी भी फ्री है।

दिए जा रहे हैं विशेष पैकेज

सफीदों गेट स्थित एक ब्यूटी पार्लर की संचालिका अर्चना ने बताया कि इस बार 1500 से लेकर 5000 रुपए तक के पैकेज पर विशेष छूट दी गई है। 2500 रुपए के पैकेज में अलग से मेकअप और मेहंदी फ्री दी जा रही है। इस पैकेज में टैनिंग रिमूवल, हेयर कट, ब्लीच, हैड मसाज, नेल आर्ट, वैक्सिंग, मेनीक्योर व पेडीक्योर शामिल हैं। इसके अलावा सिर्फ 2000 रुपए में मेकअप, थ्रेडिंग, फेशियल, ब्लीच, वैक्सिंग का ऑफर दिया जा रहा है।

क्या रखें सावधानी

1.ज्यादा भीड़ वाले पार्लर में जाने से बचें। कहीं ऐसा न हो जल्दी के चक्कर में आप पर गलत उत्पाद का इस्तेमाल हो जाए।
2. कम क्वालिटी के उत्पाद का उपयोग करवाने से बचें।
3. फेशियल या ब्लीच संबंधी उत्पाद की जांच अपनी त्वचा पर जरूर कराएं। यह जांच गर्दन या हाथ के ऊपरी भाग पर होती है।
4. चेहरे पर कोई भी ब्यूटी सेवा लेने के बाद पार्लर में दिए तौलिये का इस्तेमाल न करें, इससे एलर्जी संबंधी शिकायत हो सकती है। बेहतर होगा कि टिशू पेपर का उपयोग करें।
5. पैकेज लेने से पहले पूछ लें कि यह कौन सी त्वचा के लिए है।

8 माह से फस्र्ट एड सर्टीफिकेट के लिए रैडक्रास कार्यालय के चक्कर काट रहे युवा



नरेंद्र कुंडू 
जींद। जिला रैडक्रास कार्यालय से प्राथमिक चिकित्सा सहायता का प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवाओं के हाथ 8 माह बाद भी खाली हैं। इन युवाओं को 8 माह का लंबा समय गुजरने के बाद भी अपने फर्स्ट एड के सर्टीफिकेट नहीं मिल पा रहे है। युवाओं को फर्स्ट एड के सर्टीफिकेट के लिए बार-बार रैडक्रास कार्यालय के चक्कर काटने पड़ रहे हैं लेकिन यहां पर हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। जिला रैडक्रास कार्यालय के पास अभी तक फरवरी माह में प्रशिक्षण लेने प्रशिक्षुओं के ही प्रमाण पत्र आए हैं। युवाओं को समय पर फर्स्ट एड के सर्टीफिकेट नहीं मिलने के कारण युवाओं का भविष्य अंधकारमय है क्योंकि बिना फर्स्ट एड सर्टीफिकेट के ये नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर पा रहे हैं। इस प्रकार रैडक्रास अधिकारियों की लापरवाही का दंश बेचारे बेरोजगार युवाओं को झेलना पड़ रहा है।
प्राथमिक चिकित्सा सहायता का प्रमाण पत्र लेने की चाह में हर माह जिला रैडक्रास सोसायटी कार्यालय में सैंकड़ों युवा प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं। इसके लिए रैडक्रास द्वारा प्रत्येक आवेदक से दाखिले के लिए बाकायदा 500 रुपए की फीस जमा करवाई जाती है। दाखिला प्रक्रिया पूरी होने के बाद रैडक्रास कार्यालय में ही 10 दिनों तक प्राथमिक चिकित्सा सहायता के प्रशिक्षण के लिए कक्षाओं का दौर चलता है। जिसके प्रत्येक बैच में तकरीबन 100 से 300 तक युवक मौजूद रहते हैं। कई बार तो प्राथमिक चिकित्सा सहायता से संबंधित नौकरियों निकलने पर तो यहां आमल ओर ही होता है। प्रशिक्षण लेने के लिए युवाओं में मारामारी रहती है। 10 दिन के प्रशिक्षण के बाद विधिवत रूप से युवाओं से टैस्ट भी लिया जाता है। टैस्ट के दौरान ही रैडक्रास कार्यालय में प्रशिक्षण लेने वाले युवाओं के लिए रक्तदान कैंप का आयोजन भी किया जाता है। लेकिन यहां सभी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद भी युवाओं के हाथ मायूसी ही लग रही है। पिछले 8 माह से युवा अपने फर्स्ट  एड के सर्टीफिकेट के लिए रैडक्रास कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं लेकिन यहां इनकी सुनने वाला कोई नहीं है। यहां से हर बार इन्हें वही रटारटाया जवाब मिलता है कि अभी तक पीछे से ही उनके सर्टीफिकेट नहीं आए हैं। रैडक्रास सोसायटी के आला अधिकारियों की लापरवाही के कारण पिछले 8 माह से हजारों युवा अपने सर्टीफिकेट के इंतजार में है। अभी तक जिला रैडक्रास कार्यालय में सिर्फ फरवरी माह में प्रशिक्षण लेने वाले युवकों ही सर्टीफिकेट आए हैं। समय पर युवाओं को अपने सर्टीफिकेट नहीं मिलने के कारण उनके भविष्य पर तलवार लटी हुई है लेकिन रैडक्रास के अधिकारियों को इन युवाओं के भविष्य की कोई फिक्र नहीं है। 
क्यों पड़ती है फर्स्ट एड के सर्टीफिकेट की जरूरत
कंडैक्टरी लाइसैंस बनवाने, प्राथमिक चिकित्सक की ट्रेनिंग के लिए, आर्मी में गजटीड रैंक की पोस्ट पर भत्ती   के लिए, फैक्टरियों या कंपनियों में प्राथमिक चिकित्सक के पद पर नौकरी सहित अन्य कई विभागों में भी फस्र्ट एड के सर्टीफिकेट की जरूरत पड़ती है। 

रैडक्रास सचिव ने नहीं उठाया फोन

इस बारे में जब जिला रैडक्रास सोसायटी के सचिव रणदीप श्योकंद के मोबाइल पर संपर्क किया गया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया। 


ट्रक यूनियन खुद ही मार रही है अपने पैरों पर कुल्हाड़ी


खून से सना रहा है ट्रक यूनियन का इतिहास

नरेंद्र कुंडू
जींद। ट्रक यूनियन माल ढुलाई के मामले को लेकर ट्रांस्पोर्टरों व ट्रक आप्रेटरों के साथ विवाद खड़ा कर खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रही है। क्योंकि प्रदेश सरकार व हरियाणा व्यापार मंडल ट्रक यूनियन के वजूद को पूरी तरह से नकार चुका है। इसके अलावा माल ढुलाई को लेकर ट्रक यूनियन के दादागिरी के रवैया को रोकने के लिए हरियाणा एवं पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा भी ट्रक यूनियन पर नकेल कसने के लिए सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। लेकिन यहां पर ट्रक यूनियन जिला प्रशासन के साथ साठ-गाठ कर या राजनैतिक दबाव बनवाकर अपना काम चला रही है। ट्रक यूनियन आए दिन माल ढुलाई को लेकर दूसरे व्यवसायी ट्रक चालकों के साथ विवाद खड़ा कर रही है लेकिन जिला प्रशासन ट्रक यूनियन की इन गतिविधियों पर रोक लगाने में नाकाम साबित हो रहा है। अभी गत दिनों भी ट्रक यूनियन के प्रधान व उसके कुछ साथियों पर बिट्टू नामक एक ट्रक चालक ने उसके साथ मारपीट करने व उसके ट्रक को नुक्सान पहुंचाने के आरोप लगाए थे। जिसका अभी तक निपटारा नहीं हो सका है और डी.एस.पी. अमरीक सिंह मामले की जांच कर रहे हैं। 

खून से सना हुआ है ट्रक यूनियन का इतिहास

इससे पहले भी यहां की ट्रक यूनियन का सफर खून से भरा रहा है। ट्रक यूनियन के इतिहास के पन्नों पर खून के छीटें पड़े हुए हैं। ट्रक यूनियन में माल ढुलाई के अलावा चौधर व यूनियन की करोड़ों की संपत्ति को लेकर कई बार खून की होली भी खेली जा चुकी है। जिसमें 7 मर्डर, 18 एफ.आई.आर. व 4 डी.डी.आर. हो चुकी हैं। ट्रक यूनियन में यह खूनी खेल लगभग 15 सालों तक चला। बाद में जिला प्रशासन ने इस खूनी खेल को समाप्त करने के लिए 1997 में यहां की ट्रक यूनियन के गेट पर तालाबंदी की थी। लगभग 10 साल तक ट्रक यूनियन के गेट पर तालाबंदी रही लेकिन 2007 में ट्रक यूनियन के सदस्यों द्वारा जिला प्रशासन को लिखित में भविष्य में किसी प्रकार का कोई विवाद न करने का प्रार्थना पत्र दिया, जिस पर अमल करते हुए तत्कालीन एस.डी.एम. ने ट्रक यूनियन के गेट का ताला खोलने की अनुमति दी  थी लेकिन अब दोबारा फिर यहां विवाद सिर उठाने लगा है। 

प्रदेश में ट्रक यूनियन का नहीं है कोई वजूद

ट्रक यूनियन माल ढुलाई को लेकर दूसरे व्यवसायी ट्रक चालकों के साथ बिना वजह विवाद खड़ा करती है। अनाज मंडियों में ढुलाई का सीजन शुरू होने पर ट्रक यूनियन द्वारा अनाप-शनाप रेट तय किए जाते हैं। दूसरे व्यवसायी ट्रक चालकों द्वारा ढुलाई का काम करने पर उनके साथ मारपीट की जाती है जो सरासर गलत है। खुद मुख्यमंत्री भूपेंद्र ङ्क्षसह हुड्डा 2005 में ट्रक यूनियन के वजूद को नकार चुके हैं और अब उच्च न्यायालय द्वारा भी ट्रक यूनियन के विपक्ष में फैसला दिया जा चुका है। 
बजरंग दास गर्ग, प्रदेशाध्यक्ष
व्यापार मंडल, हरियाणा

ट्रक चालकों की सुविधा के लिए बनाई गई है यूनियन

ट्रक चालकों की सुविधा के लिए यूनियन बनाई गई है, ताकि सभी ट्रक चालकों को बराबर काम मिल सके ओर ट्रक चालक अपना गुजर-बसर कर सकें। यूनियन द्वारा मिल बैठकर ट्रक चालकों के विवाद  निपटा दिए जाते हैं। गत दिनों ट्रक चालक के साथ जो विवाद हुआ है वह मामूली झगड़ा था। उसे निपटाने के लिए उनके द्वारा पूरी कोशिश की जा रही है।  
सतबीर, प्रधान
ट्रक यूनियन, जींद

नहीं पनपे दिया जाएगा किसी भी तरह का विवाद

पुलिस प्रशासन द्वारा ट्रक यूनियन पर पूरी नजर रखी जा रही है। यहां किसी भी प्रकार के विवाद को पनपे नहीं दिया जाएगा। गत दिनों ट्रक चालक व ट्रक यूनियन के प्रधान का जो झगड़ा हुआ है उसकी जांच की जा रही है। जल्द से जल्द इस मामले का निपटारा कर दिया जाएगा। 
अमरीक सिंह, डी.एस.पी.
जींद

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

त्यौहारों के साथ ही सजने लगे ड्राई फ्रूट के बाजार


ड्राई फ्रूट भी महंगाई की चपेट में  

नरेंद्र कुंडू 
जींद। दीपावली का त्यौहार नजदीक आते ही ड्राई फ्रूट के बाजार सजने लगे हैं। लोग मिठाइयों में मिलावट के चलते ड्राई फ्रूट में ही ज्यादा विश्वास जता रहे हैं। त्यौहारी सीजन पर अपने सगे सम्बंधियों को उपहार देने के लिए जमकर ड्राई फ्रूट की खरीददारी कर रहे हैं। इस बार लोग बंद पैकेट की बजाए खुदरा खरीदने में ही समझदारी दिखा रहे हैं। महंगाई के चलते इस बार ड्राई फ्रूट की कीमतों में भी 20 से 30 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। इस समय बाजार में सबसे ज्यादा अमेरीकन बादाम व काजू की धूम मची हुई है। 
दीपावली पर्व नजदीक  आने के कारण बाजारों की रौनक बढऩी शुरू हो गई है। शहर में ड्राई फ्रूट के बाजार सजने लगे हैं। इस महंगाई की मार से ड्राई फ्रूट का बाजार भी अछूता नहीं रहा है। इस बार बादाम, काजू, किशमिश, छुहारे, पिस्ता, अखरोट गिरी, गुरमानी के दामों में 20 से 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इससे पैकेट की कीमतों में भी बढ़ौतरी तय है। बाजार में 100 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक के ड्राई फ्रूट के डिब्बे उपलब्ध हैं। अबकी बार बाजारा में सबसे ज्यादा धूम अमेरीकन बादाम व काजू की है। ड्राई फ्रूट में सबसे ज्यादा उछाल काजू व पिस्ता की कीमत में हुआ है। ड्राई फ्रूट के बंद पैकटों से भी लोगों का विश्वास कम हुआ है। इसलिए लोग खुदरा खरीद कर पैक करवाने में ही ज्यादा समझदारी दिखा रहे हैं। इसलिए बाजार में रेहडिय़ों पर भी खुले ड्राई फ्रूट बिकते नजर आने लगे हैं। मिठाइयों में मिलावट की आशंका के कारण मिठाइयों से लोगों का मोह भंग हो चुका है। अब लोग ड्राई फ्रूट में ही ज्यादा विश्वास दिखा रहे हैं। जिस कारण पिछले पांच साल से मिठाई की बिक्री में कमी व ड्राई फ्रूट की बिक्री में 20 से 30 प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई है। इसलिए त्यौहारी सीजन में सगे सम्बंधियों को उपहार देने के लिए जमकर ड्राई फ्रूट की ही खरीदारी कर रहे हैं। ड्राइ फ्रूट की मांग बढऩे के कारण शहर में ड्राई फ्रूट का कारोबार भी बढ़ा है। 

जिले में 10 करोड़ तक हो जाता है कारोबार

दीपावली के सीजन पर शहर में लगभग 300 के आस-पास दुकानदार ड्राई फ्रूट का काम करते हैं। पिछले 5 सालों से मिठाइयों व घी में हो रही मिलावट के कारण लोगों का रूझान मिठाई के प्रति कम हो रहा है तथा ड्राई फ्रूट का कारोबार बढ़ रहा है। इसलिए दीपावली के सीजन पर लोग जमकर ड्राई फ्रूट की खरीदारी करते हैं। इस दौरान शहर में ड्राई फ्रूट का 5 से 6 करोड़ रुपए तथा पूरे जिले में 10 करोड़ रुपए तक का कारोबार हो जाता है। 
ड्राई फ्रूट भी महंगाई की चपेट में 
इस बारे में जब ड्राई फ्रूड विक्रेता अखिल से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया लगातार बढ़ रही महंगाई का असर ड्राई फ्रूट पर भी साफ दिखाई दिया है। ड्राई फ्रूट के दामों में हुई वृद्धि के कारण यहां के दुकानदारों ने इनकी खरीददारी सीधे दिल्ली से करनी शुरू कर दी है। ड्राई फ्रूट का छोटा-मोटा कारोबार करने वाले दुकानदार पहले यहीं से ड्राई फ्रूट की खरीदारी करते थे, लेकिन अब वे भी त्यौहारी सीजन पर अधिक से अधिक पैसे कमाने के चक्कर में ड्राई फ्रूट की खरीदारी सीधे दिल्ली से करते हैं। 

ड्राई फ्रूट की कीमतें प्रति किलोग्राम

ड्राई फ्रूट का नाम पहले के भाव आज के भाव 
बादाम           400  450
काजू           420 680
दाख                   200 300
पिस्ता                   580 700
गुरमानी           150 200
अखरोड़ गिरी           650 700
किशमिश           200 260


अभी 'खाप अदालत' की वेटिंग लिस्ट में है किसानों व कीटों का मुकद्दमा


विवाद के निपटारे के लिए जनवरी या फरवरी में होगी सर्व जातीय सर्व खाप की महापंचायत

नरेंद्र कुंडू 
जींद। गौत्र विवाह के मामलों में तालिबानी फरमान सुनाने के लिए बदनाम तथा हाल ही में रेप व गैंगरेप की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए लड़के व लड़की की उम्र कम करने के बयान के बाद सुर्खियों में आने वाली खाप पंचायत ने किसानों व कीटों के मुकद्दमे के फैसले को अभी वोटिंग लिस्ट में रखा दिया है। 15 दिसंबर से शुरू होने वाले जाट आरक्षण के ममाले से निपटने के बाद ही खाप पंचायतों द्वारा इस मसले का हल निकालने के लिए अगला कदम उठाया जाएगा। इसके लिए खाप पंचायत द्वारा अगले वर्ष जनवरी या फरवरी माह में एक सर्व जातीय सर्व खाप महापंचायत का आयोजन किया जाएगा। हालांकि खाप प्रतिनिधियों द्वारा निडाना गांव में 18 बैठकों का आयोजन कर इस विवाद की सुनवाई की सभी प्रक्रियाएं पूरी की जा चुकी हैं। 

विवाद के निपटारे के लिए किसानों ने खटखटाया था खाप का दरवाजा

इंसानों के बड़े-बड़े विवादों के निपटारे के लिए मशहूर खाप पंचायतों की अदालत में यह एक अनोखा मामला आया है। निडाना गांव के कुछ कीट मित्र किसानों ने लगभग 4 दशकों से किसानों व बेजुबान कीटों के बीच चली आ रही जंग के निपटारे के लिए जून माह में खाप पंचायत के पास चिट्ठी डालकर गुहार लगाई थी। इसके बाद खाप प्रतिनिधियों ने किसानों की अर्जी को मंजूर कर इस विवाद के निपटारे के लिए अपने हाथ में लिया था। इस विवाद पर निर्णय देते वक्त खाप पंचायतों की शाख पर कोई दाग न लगे इसके लिए खाप प्रतिनिधियों ने दोनों पक्षों की सुनवाई के लिए निडाना गांव में लगातार 18 सप्ताह तक हर मंगलवार को एक पाठशाला का आयोजन करने का निर्णय लिया था। इसमें 26 जून से निडाना में एक पाठशाला की शुरूआत की गई। इस पाठशाला में हर मंगलवार को विभिन्न खापों के प्रतिनिधि विवाद की सुनवाई के लिए आते थे। गत मंगलवार को खाप पंचायतों की यह प्रक्रिया पूरी हो गई है। 

जंग में जरूरी है दुश्मन की पहचान

किसानों के समक्ष अपने विचार रखते हुए खाप के संयोजक कुलदीप ढांडा।

किसान पाठशाला के संयोजक डा. सुरेंद्र दलाल का कहना है कि जंग में दुश्मन की पहचान जरूरी है, लेकिन किसानों और कीटों के बीच लगभग 4 दशकों से जो जंग चली आ रही है इसमें किसानों को अपने दुश्मन की पहचान ही नहीं है। किसान अज्ञान के कारण इस चक्रव्यहू में फंसे हुए हैं और अधिक उत्पादन की चाह में अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग कर कीटों को मार रहे हैं। फसलों में बढ़ते रासायनिकों के प्रयोग के कारण हमारा खान-पान जहरीला हो चुका है और कई लाइलाज बीमारियों ने जन्म ले लिया है। डा. दलाल ने बताया कि कीट न तो किसान के दुश्मन हैं और न ही किसान के मित्र हैं। ये तो केवल अपना जीवन चक्र चलाने के लिए फसल में आते हैं। किसानों को इस बात का ज्ञान जरूर होना चाहिए कि कीट हमारी फसल में क्यों आते हैं और क्या करते हैं। इसलिए किसानों को कीटों के क्रियाकलापों को समझना होगा। 

मामले के निपटारे के लिए किया जाएगा महापंचायत का आयोजन

सर्व जातीय सर्व खाप के संयोजक कुलदीप ढांडा ने बताया कि खाप पंचायतों के लिए यह विवाद किसी चुनौती से कम नहीं है। इस विवाद को निपटाते वक्त खाप पंचायतों से किसी प्रकार का गलत फैसला नहीं हो इसके लिए हर सप्ताह अलग-अलग खाप प्रतिनिधियों ने निडाना पहुंचकर इस मसले का अध्यन किया है। नवंबर माह में रबी की फसल की बिजाई के कारण किसानों के पास समय नहीं है और 15 दिसंबर के बाद खाप पंचायत जाट आरक्षण के लिए संघर्ष जारी करेंगी। इसलिए इस विवाद पर फैसला सुनाने के लिए जनवरी या फरवरी माह में सर्व जातीय सर्व खाप महापंचायत का आयोजन किया जाएगा। इस महापंचायत में सभी खाप प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करने के बाद ही फैसला सुनाया जाएगा। 


गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

धू-धू कर जल गया घमंड का प्रतीक



नरेंद्र कुंडू 
जींद। जिलेभर में बुधवार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक विजयदशमी का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया गया। शहर में जगह-जगह कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। एक चिंगारी के साथ ही घमंड का प्रतिक रावण का सिर धू-धू कर जल गया। रावण दहन के साथ ही चारों तरफ भगवान श्री राम के जयकारे गुंजने लगे। श्री सनातन धर्म आदर्श रामलीला क्लब (किला) द्वारा चौ. छोटू राम किसान कॉलेज के प्रांगण में रावण दहन किया गया। रावण दहने से पूर्व क्लब द्वारा शहर में भगवान श्री राम की झांकियां भी निकाली गई। इसके बाद छोटू राम किसान कॉलेज के प्रांगण में रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतलों का दहन किया गया।
कॉलेज प्रांगण में मेले में खरीदारी करते लोग। 
विजयदशमी के अवसर पर शहर में जगह-जगह कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। श्री सनातन धर्म आदर्शन रामलीला क्लब द्वारा चौ. छोटू राम किसान कॉलेज के प्रांगण में कार्यक्रम का आयोजन कर रावण दहन किया गया। कार्यक्रम में जींद के इनैलो विधायक डा. हरिचंद मिढ़ा ने बतौर मुख्यातिथि तथा विनोद चंद व पूर्व कुलपति डा. ए.के. चावला ने विशेष अतिथि के तौर पर शिरकत की। मुख्यातिथि डा. हरिचंद मिढ़ा ने कहा कि दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिक है। इस दिन घमंड का सिर झुका था तथा असत्य पर सत्य की जीत हुई थी। भगवान श्रीराम ने रावण को उसके किए की सजा देकर माता सीता को मुक्त करवाया था। रावण दहन से पूर्व क्लब द्वारा शहर में झांकियां निकाली गई। झांकियां शहर के मेन बाजार से होते हुए किसान कॉलेज पहुंची। यहां पर राम व रावण की सेना के बीच युद्ध का आयोजन किया गया। भगवान श्री राम ने रावण की नाभी में तीर माकर विजय प्राप्त की। कॉलेज प्रांगण में दहन के लिए 50 फीट ऊंचा रावण तथा 45-45 फीट ऊंचे कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतले तैयार किए गए थे। आतिशबाजी के लिए भी विशेष तैयारियां की गई थी। रावण दहन के साथ ही पूरे जोर-शोर से आतिशबाजी शुरू हो गई। घमंड व बुराई का प्रतिक रावण धूं-धूं कर जलने लगा। रावण दहन के साथ ही दर्शकों ने भगवान श्री राम के जयकारे लगाए। रावण दहन देखने के लिए काफी संख्या में दर्शक कॉलेज प्रांगण में पहुंचे हुए थे। इस दौरान कॉलेज प्रांगण में मेले का आयोजन भी किया गया। दर्शकों ने मेले में जमकर लुत्फ उठाया व खरीदारी की।

सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस ने किए थे पुख्ता प्रबंध

सुरक्षा में तैनात पुलिसबल व फायर ब्रिगेड की गाडिय़ां। 
रावण दहन के दौरान किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से निपटने के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा पुख्ता प्रबंध किए गए थे। डी.एस.पी. अमरीक ङ्क्षसह के नेतृत्व में भारी संख्या में पुलिसबल मौजूद था। सादी वर्दी में भी पुलिस कर्मचारी चप्पे-चप्पे पर नजर बनाए हुए थे। इस दौरान आगजनी की घटना से निपटने के लिए फायर ब्रिगेड की गाडिय़ां भी कॉलेज प्रांगण में मौजूद थी।


 राम, लक्ष्मण, हनुमान की वेशभूषा में सजे कलाकार।

 रावण दहन देखने के लिए उमड़ी दर्शकों की भीड़। 


 रावण दहन के दौरान आतिशबाजी का नजारा। 

 धूं-धूं कर जलते रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतले।








...यहां टूट जाती हैं धर्म की सभी बेडिय़ां


मुस्लिम व हिंदू कारीगर लगभग 2 दशकों से एक साथ कर रहे हैं पुतले बनाने का काम

नरेंद्र कुंडू
जींद। दशहरे पर रावण दहन को लोग असत्य पर सत्य व बुराई पर अच्छाई की जीत मानते हैं लेकिन कहीं न कहीं यह त्यौहार ङ्क्षहदू-मुस्लिम भाईचारे का प्रतिक भी है। हिंदुओं के पर्व दशहरे पर दहन के लिए जो पुतले बनाए जा रहे हैं उन पुतलों का निर्माण करने वाले हाथ मुस्लिम कारीगरों के हैं। इतना ही नहीं यहां मुस्मिल कारीगरों के साथ-साथ हिंदू कारीगर भी पुतले निर्माण में इनका पूरा साथ दे रहे हैं। लगभग पिछले दो दशकों से ये कारीगर यहां के रामलीला क्लबों के लिए रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतले तैयार कर रहे हैं। 
हिंदू धर्म में दशहरे पर रावण दहन को लोग बुराई पर अच्छाई की जीत मानते हैं और इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं क्योंकि इस दिन भगवान श्रीराम ने लंका में रावण को मार कर विजय प्राप्त की थी। लेकिन यहां पर दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का प्रतिक भी बना हुआ है। रामलीला क्लबों के लिए दशहरे पर दहन के लिए रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतले बनाने वाले कारीगर मुस्लिम समुदाय के हैं और हिंदू समुदाय के कारीगर भी इनका सहयोग करते हैं। पुतलों के निर्माण के लिए जींद आए मुज्जफरनगर (यू.पी.) निवासी अनवर व चांदी ने बताया कि उन्होंने अपने पूर्वजों से यह कारीगिरी सीखी है। उनके दादा-परदादा भी इसी तरह पुतल बनाने का काम करते थे। वे पिछले करीब 2 दशकों से इसी काम से जुड़े हुए हैं। उनकी 12 सदस्यों की इस टीम में कुछ कारीगर हिंदू समुदाय के भी हैं लेकिन उनके दिल में इस दौरान कभी भी हिंदुओं के प्रति कोई दुर्भावना स्थान नहीं बना पाई है। वे सभी एक साथ मिलकर काम करते हैं। इस बार उन्होंने जींद के अलावा कैथल, पेहवा, खनौरी, पातड़ा,पेहवा में भी पुतलों का निर्माण किया है। जींद में उन्होंने 50 फीट का रावण तथा 45-45 फीट के कुंभकर्ण व मेघनाथ के पुतले तैयार किए हैं। इससे यह प्रतित होता है कि दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का भी प्रतिक है। इस प्रकार हिंदू व मुस्लिम समुदाय के कारीगरों के इस प्यार व भाईचारे को देखकर यह साफ हो रहा है कि धर्म की बेडिय़ां भी इन्हें जुदा नहीं कर पाई हैं। इंसानियत के रिश्ते के आगे धर्म की बेडिय़ां कच्चे धागे की तरह टूट कर बिखर गई हैं।
 छोटू राम किसान कॉलेजे के सामने स्थित श्मशान घाट में पुतलों के निर्माण में लगे कारीगर। 

सावन में हरिद्वारा में करते हैं कावड़ बनाने का कार्य

अनवर ने बताया कि वे दशहरे के अलावा हिंदुओं के अन्य त्यौहारों में भी शरीक होते हैं। वे सावन माह में शिव भक्तों के लिए हरिद्वारा में कावड़ बनाने का कार्य करते हैं। इस दौरान भी हिंदू कारीगर उनके साथ काम करते हैं। अनवर ने बताया कि उन्हें हिंदू-मुस्मिल में कोई भेदभाव नजर नहीं आता बल्कि हिंदुओं के साथ उनके त्यौहारों में शरीक होकर वे अपना व अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं। 


मर्यादा पुरूषोत्तम की 'रामलीला' बनी 'रासलीला'


 रामलीला मंच पर बढ़ रही अश्लीलता से आहत हो रही हैं लोगों की धर्मिक भावनाएं

नरेंद्र कुंडू 
जींद। एक दौर था जब रामलीला के प्रति लोगों की बड़ी धर्मिक भावना होती थी और लोग बड़े श्रद्धाभाव से रामलीला देखने के लिए जाते थे। रामलीला के कलाकारों के प्रति भी लोगों में बड़ी श्रद्धा होती थी। लोगों को रामलीला के कलाकारों में ही भगवान की तस्वीर नजर आती थी। उन दिनों रामलीला देखने के लिए बड़ा जनसैलाब उमड़ता था और रामलीला ग्राऊंड में दर्शकों को बैठने के लिए स्थान भी नहीं मिलता था। रात के समय में रामलीला देखने के लिए लोग दिन में ही अपना स्थान बुक कर लेते थे। उस समय मनोरंजन के साधन भी सीमित ही होते थे इसलिए लोग रामलीला के माध्यम से भी अपना मनोरंजन का शौक पूरा करते थे। लेकिन जैसे-जैसे समय ने करवट ली और तकनीकी युग ने धरती पर अपने कदम रखे तो प्रचार-प्रसार के साधन भी बढऩे लगे। नई-नई तकनीकों के साथ ही घरों में मनोरंजन के साधन भी स्थापित होने लगे। बढ़ते मनोरंजन के साधनों के साथ ही पाश्चात्य संस्कृति ने भी हमारी संस्कृति पर प्रहार कर दिया। घर पर ही मनोरंजन के अच्छे साधन मुहैया होने के कारण रामलीला के प्रति लोगों का मोह भंग होने लगा और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण लोगों में धर्मिक भावना भी कम होती चली गई। रामलीला में दर्शकों की कमी को देखते हुए रामलीला संचालकों भी अपना ट्रेंड बदलने के लिए मजबूर हो गए। अब रामलीला का स्थान रास लीला ने ले लिया है। रामलीला संचालकों द्वारा दर्शकों को लुभाने के लिए रामलीला में फिल्मी गीतों को शामिल किया जाने लगा। अब रामलीला के मंच पर दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए जौकरों की जगह फिल्मी धूनों पर थिरकने वाले डांसरों ने ले ली है। अब दर्शकों को आकॢषत करने के लिए रामलीला संचालकों द्वारा रामलीला जैसे पवित्र मंच पर खुलकर अश्लीलता परोसी जा रही है। आधुनिकता के इस दौर में मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम के मंच पर अश्लील फिल्मी धूनों पर लड़कियां डांस करती नजर आती हैं। भगवान श्री राम की लीला अब रास लीला में तब्दिल होने लगी है। 

दर्शकों में नहीं रही अनुशासन की भावना

रामलीला के मंच पर लगभग 38 वर्षों तक हास्य कलाकार की भूमिका निभाने वाले मुकेश उर्फ मुकरी ने बताया कि बढ़ती अश्लीलता के कारण लोगों की धर्मिक भावना आहत होती है। अश्लील गीतों के कारण अब दर्शकों में अनुशासन की कमी हो चली है। इससे रामलीला के दौरान लड़ाई-झगड़े होने के आसार बने रहते हैं।

रामलीला का करवाया जा रहा है लाइव

 शहर की एक रामलीला में फिल्मी गीतों पर थिरकते डांसर। 
श्री सनातन धर्म आदर्श रामलीला क्लब (किला) के संरक्षक संत लाल चुघ ने बताया कि शहर में उनकी रामलीला सबसे पुरानी है। वे खुद 1957 से इस क्लब से जुड़े हुए हैं और उन्होंने रामलीला में कई वर्षों तक लक्ष्मण का किरदार भी निभाया है। लेकिन आज तक उनके क्लब द्वारा कभी भी रामलीला के मंच पर डांसर नहीं बुलाए गए हैं और न ही किसी प्रकार के फिल्मी अश्लील गाने चलाए गए हैं। क्लब का रामलीला के आयोजन का मुख्य उद्देश्य भगवान श्री राम का संदेश घर-घर पहुंचाना है। इसलिए अब रामलीला में दर्शकों को लेकर वो पहले वाली बात नहीं रही। लेकिन फिर भी उनके क्लब द्वारा घर बैठे ही लोगों को रामलीला दिखाने के लिए केबल के माध्यम से रामलीला का लाइव करवाया जाता है। ताकि अधिक से अधिक लोगों तक भगवान श्री राम का संदेश पहुंचाया जा सके। 

पहले कलाकारों के प्रति लोगों में होती थी श्रद्धा

लगभग 10 वर्षों तक रामलीला के मंच पर राम, लक्ष्मण व सीता का किरदार निभाने वाले कलाकार विनय अरोड़ा ने बताया कि पहले लोगों में कलाकारों के प्रति बड़ी श्रद्धा होती थी। लोगों को कलाकारों में  ही भगवान की तस्वीर नजर आती थी। इसलिए हर रोज अलग-अलग व्यक्ति के घर कलाकारों के लिए खाने का आयोजन किया जाता था। लेकिन अब लोगों की मानसिकता बदल चुकी है और कलाकारों के प्रति लोगों में श्रद्धा नहीं रही है। अब ज्यादातर लोग रामलीला में सिर्फ लड़कियों का डांस देखने के लिए ही जाते हैं। 


बड़ा नाजूक होता है प्रकृति व जीव का रिश्ता


किसान-कीट विवाद की सुनवाई के लिए खाप पंचायत की आखरी बैठक संपन्न

विवाद पर फैसला सुनाने के लिए दिसंबर या जनवरी में होगी खाप की बैठक

नरेंद्र कुंडू 
जींद। किसान-कीट की विवाद की सुनवाई के लिए मंगलवार को खाप पंचायत की 18वीं बैठक हुई। बैठक  की अध्यक्षता सर्व जातीय सर्व खाप के संयोजक कुलदीप ढांडा ने की। इस अवसर पर बैठक में अखिल भारतीय जाट महासभा के युवा राष्ट्रीय महासचिव अनिल बैनिवाल, घनघस खाप के प्रतिनिधि सूबे सिंह, मलिक खाप के प्रतिनिधि कांसीराम मलिक, गांव मांडी (पानीपत) निवासी प्रगतिशील किसान रणबीर सिंह, रणधीर सिंह तथा वरिष्ठ पशु चिकित्सक राजबीर चहल भी विशेष रूप से मौजूद रहे। बैठक में कीट मित्र किसानों ने पूरे लेखेजोखे के साथ बेजुबान कीटों का पक्ष खाप प्रतिनिधियों के समक्ष रखा।
राजबीर चहल ने किसानों को सम्बोधित करते हुए बताया कि प्रकृति के अपने नियम हैं। इन नियमों को समझना इंसान के बस की बात नहीं है। प्रकृति व जीव का रिश्ता बड़ा नाजूक होता है। इसलिए हमें प्रकृति के साथ ज्यादा छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। चहल ने बताया कि पृथ्वी पर जन्म लेने वाला हर जीव अपने दायरे से बाहर निकल कर भी अपनी वंशवृद्धि का प्रयास करता है। इसी प्रकार पौधों में भी अपनी वंशवृद्धि की लालसा होती है और पौधे भी धरती पर अपना बीज बिखेरने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। चहल ने नरमे की फसल के खेत की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इस समय नरमे के पौधों ने अपने पत्तों को पूरी तेजी से सिकोडऩा शुरू कर दिया है, ताकि उसके टिड्डो तक ज्यादा से ज्यादा धूप पहुंच सके और धूप से गर्मी लेकर टिड्डे पूरी तरह से खिल सकें, ताकि उसका वंश चलता रहे।

उत्पादन बढ़ाने में हाईब्रिड बीज की नहीं कोई अहम भूमिका

मास्टर ट्रेनर रणबीर मलिक ने बताया कि अधिक पैदावार में हाईब्रिड बीज की कोई भूमिका नहीं होती है। पैदावार बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका अच्छी  ङ्क्षसचाई, खेत में पौधों की पर्याप्त संख्या, पौधों को समय पर पर्याप्त खुराक व मौसम की होती है। हाईब्रिड बीज का नाम तो सिर्फ किसानों को गुमराह करने के लिए तैयार किए गए हैं।

पूरे सीजन में एक बार भी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघ पाए कीट

कपास की फसल में शाकाहारी कीटों के नुक्सान के स्तर को जानने के लिए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा एक सीमा निर्धारित की गई है। इसमें सफेद मक्खी की प्रति पत्ता औसत 6, हरा तेला की 2 से अधिक व चूरड़ा की संख्या 10 निर्धारित की गई है लेकिन किसानों द्वारा तैयार किए गए कीट बही खाते में कोई भी कीट पूरे सीजन में इस लक्ष्मण रेखा को पार करना तो दूर इसके नजदीक भी नहीं पहुंच पाया। कीटों द्वारा तैयार किए गए कीट बही खाते में इस पूरे सीजन में सफेद मक्खी की औसत 4, हरे तेले की संख्या पौने 2 तथा चूरड़े की संख्या 6 ही दर्ज की गई है।

बैठक में खाप प्रतिनिधियों व किसानों में हुई तीखी बहस

कपास की फसल में कीट निरीक्षण करते किसान। 
बैठक में अलेवा के किसान जोगेंद्र ने जब मिलीबग के नुक्सान का आंकड़ा दर्ज करवाते समय गोलमोल सा जवाब दिया तो सर्व खाप के संयोजक कुलदीप ढांडा ने किसानों के साथ बहस करते हुए कहा कि इस विवाद के निपटारे पर फैसला सुनाने के लिए भविष्य में जब भी सर्व जातीय सर्व खाप की बैठक होगी तो उसमें पूरे तथ्यों के साथ आंकड़े प्रस्तुत किए जाएंगे, क्योंकि खाप पंचायत द्वारा जो भी निर्णय लिया जाएगा वह एक प्रकार से पूरे समाज के लिए मार्गदर्शन का काम करेगा। इसलिए कोई भी आंकड़ा आधा अधूरा नहीं होना चाहिए। इससे खाप पंचायत की शाख पर दाग लग सकता है।

दिसंबर या जनवरी माह में होगी खाप की बैठक 

किसान-कीट विवाद की सुनवाई के लिए खाप पंचायत की आखरी बैठक संपन्न हुई। अब इस विवाद पर निर्णय देने के लिए सर्व जातीय सर्व खाप महापंचायत की बैठक दिसंबर के अंतिम सप्ताह या जनवरी के प्रथम सप्ताह में होगी। उसी बैठक में इस विवाद के निपटारे पर खाप पंचायत अपना फैसला सुनाएगी। अभी इसका फैसला भविष्य के गर्भ में है।

 कीट बही खाते में आंकड़े दर्ज करवाते किसान। 




बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

खेल-खेल में बन गया कीटों का मास्टर

6 वर्षीय निखिल को 100 से भी ज्यादा कीटों के नाम कंठस्थ

कीट को देखते ही उसके जीवनचक्र को पकड़ लेती हैं निखिल की पारखी नजरें

नरेंद्र कुंडू
जींद। कहते हैं कि प्रतिभा किसी परिचय की मोहताज नहीं होती है, लेकिन निडानी के मिनी साइंटिस्ट 6 वर्षीय निखिल ने अपनी प्रतिभा व विलक्षण बुद्धि से इस कहावत को उलट दिया है। 6 वर्षीय निखिल ने छोटी सी उम्र में जो उपलब्धि हासिल की है, उससे साबित हो गया है कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती है। जिले के निडाना गांव निवासी रणबीर मलिक का पुत्र निखिल छोटी सी उम्र में बड़े-बड़े कृषि वैज्ञानिकों की समझ व ज्ञान पर भारी पड़ता है। जिस उम्र में बच्चे ठीक से अपने परिवार के सदस्यों के नाम भी याद नहीं रख पाते, उस उम्र में निखिल मलिक को 100 से भी ज्यादा कीटों के नाम जुबानी याद हैं।

कक्षा प्रथम तो नॉलेज पी.एच.डी. के स्तर की

रणबीर मलिक का 6 वर्षीय पुत्र निखिल मलिक फिलहाल गांव के ही स्कूल में प्रथम कक्षा की पढ़ाई कर रहा है। निखिल ए, बी, सी, डी के साथ खेती-किसानी के गुर भी सीख रहा है। निखिल को कपास की फसल में आने वाले सभी मांसाहारी व शाकाहारी कीटों की पहचान है तथा उसे यहां तक भी मालूम है कि अब फसल पर ये कीट क्या प्रभाव छोडे़गे? ताज्जुब की बात तो यह है कि खेती के इस कारोबार में जहां बड़े-बड़े किसान व कृषि विशेषज्ञ तक कीटों की पहचान में धोखा खा जाते हैं, उन कीटों को निखिल की पारखी नजरें पलक झपकते ही पहचान लेती हैं। निखिल कीट को देखते ही उसके पैदा होने से लेकर उसकी सातों पीढिय़ों तक की पौथियां किसानों के सामने खोल कर रख देता। निखिल अपने पिता रणबीर मलिक की तरह ही किसानों को कीटों की पढ़ाई करवाने के साथ-साथ कीटनाशक रहित खेती के लिए भी प्रेरित कर रहा है। इस प्रकार रणबीर मलिक का पुत्र निखिल मलिक छोटी सी उम्र में ही नन्हा धरतीपुत्र बनने जा रहा है।

यूं शुरू हुई निखिल की कीटों की पढ़ाई

2010 में कृषि विभाग की तरफ से उनके खेत में महिला किसान पाठशाला की शुरूआत की गई थी। यह पाठशाला 18 सप्ताह तक चली थी। उस समय निखिल की उम्र सिर्फ चार वर्ष की थी। निखिल अपनी मां अनीता मलिक के साथ इस महिला किसान पाठशाला में जाता था। इस पाठशाला में महिलाओं के बीच बैठकर इनकी बातें सुनने और पाठशाला में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले प्रयोगों को देखकर निखिल के दिमाक में भी कीटों  ने घर कर लिया। बस फिर क्या था यहीं से हो गया निखिल की कीटों की पढ़ाई का सिलसिला शुरू। इस पाठशाला में कीटों के प्रति उसका रुझान इतना बढ़ गया कि वह कीटों की पहचान करने के साथ उन सभी के नाम व काम भी कंठस्थ कर गया। इस प्रकार मात्र 18 सप्ताह में पांच वर्षीय निखिल ने कीट मास्टर की डिग्री हासिल कर ली।

कीटों का ज्ञान इतना की साइंटिस्ट भी शर्मा जाएं

निखिल मलिक को वैसे तो कपास की फसल में आने वाले 100 से भी ज्यादा कीटों के नाम व उनके क्रियाकलापों के बारे में जानकारी हैं। लेकिन इनमें से 60 से भी ज्यादा ऐसे मासाहारी व शाकाहारी कीट हैं, जिनके पूरे जीवनचक्र के बारे में निखिल को जानकारी है कि किस कीट के अंडों में से कितने दिन में बच्चे निकलते हैं, कितने दिन में बच्चे प्रौढ़ होते हैं, कितने दिनों में प्रौढ़ से पतंगा बनता है और ये क्या-क्या खाते हैं। निखिल के दिमाग में इन कीटों के पूरे जीवनकाल की तस्वीर बिल्कुल सही ढंग से छप चुकी है। निखिल कपास की फसल को देखकर यह भी बता देता है कि अब कपास में कौन सा कीड़ा आया हुआ है और अब आगे यह क्या करेगा? कौन सा कीट किस किस कीट को खाएगा? या कौन सा कीड़ा दूसरे कीडे़ के पेट के अंदर अपने बच्चे पलवाएगा? और इन सबका कपास की फसल पर क्या प्रभाव पड़ेगा। निखिल को इस समय लगभग 100 मांसाहारी व शाकाहारी कीटों की पहचान है, जिनमें मुख्य रूप से हरा तेला, सफेद मक्खी, मिलीबग, चूरड़ा, हथजोड़ा, मकड़ी, ड्रेगल फ्लाई हैलीकाप्टर, फेल मक्खी, अंगीरा, फंगीरा, जंगीरा, ततैया, अंजनहारी, भंभीरी, खातन, कुम्हारन, तेलन, लेडी बिटल, क्राइसोपा आदि शामिल हैं।

पिता भी लगे हैं कीटों के शिक्षण में 

निडाना गांव निवासी निखिल मलिक के पिता रणबीर मलिक एक साधारण किसान हैं और वह खेतीबाड़ी के सहारे ही अपने परिवार का गुजर-बसर करता है। रणबीर कीट मित्र किसान है और यह पिछले चार सालों से निडाना गांव में चल रही किसान खेत पाठशाला से जुड़ा हुआ है। इस पाठशाला में किसानों को खेत में बैठाकर कीटों की पहचान करवाने के साथ-साथ कीटनाशक रहित खेती के लिए प्रेरित किया जाता हैं। फिलहाल रणबीर मलिक इस पाठशाला में मास्टर ट्रेनर के रूप में कार्य कर रहा है और अपने खर्च पर ही आस-पास के किसानों को कीटनाशक रहित खेती के गुर सीखाकर उनकी थाली को जहरमुक्त करने के प्रयास में जुटे हुए हैं। इसके अलावा रणबीर मलिक कृषि पर ब्लॉग भी लिखते हैं और उनके ब्लॉग इंटरनेट पर देश ही नहीं विदेश में भी लोग देखते हैं। निखिल की मम्मी अनीता भी महिला खेत पाठशाला की सक्रिय सदस्य हैं और महिला खेत पाठशाला में महिलाओं को जोडऩे में अहम योगदान कर रही हैं।

दादी को प्रतिदिन दिखाता है कीटों की गतिविधियां

निखिल ने 2010 में महिला किसान पाठशाला में कीटों की पढ़ाई पूरी करने के बाद 2011 में गांव में खाली पड़े अपने प्लाट में कपास की फसल की बिजाई करवाई थी। इस फसल की देखरेख निखिल प्रतिदिन स्वयं करता था और अपनी दादी चंद्रपति को भी कपास की फसल पर होने वाली गतिविधि के बारे में बताता है। निखिल की इन गतिविधियों को देखकर उसकी दादी चंद्रपति को भी कुछ कीटों की पहचान हो गई है। निखिल की इस छोटी उम्र में बड़ी जानकारी से उसकी दादी भी काफी खुश हैं।
कपास की फसल में कीटों का अवलोकन करता निखिल।

लैपटॉप पर अपनी दादी को कीटों की जानकारी देता निखिल।

लैपटॉप पर भी करवाता है कीटों की पहचान

रणबीर मलिक ने बताया कि उनके घर पर एक लैपटॉप है। शुरू-शुरू में तो वह निखिल को लैपटॉप नहीं चलाने देता था, क्योंकि उसे डर रहता था कि कहीं निखिल इसे खराब न कर दे। लेकिन निखिल चोरी-छिपे लैपटॉप को चला लेता था और इस प्रकार धीरे-धीरे निखिल को लैपटॉप की जानकारी भी हो गई। मलिक ने बताया कि अब निखिल घर में आने वाले मेहमानों, आस-पास की महिलाओं व किसानों को लैपटॉप में डाली गई कीटों की फोटो दिखाकर उनकी पहचान करवाता है।


शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

बिना कीटनाशकों के भी अच्छी पैदावार ले रही हैं महिलाएं


नरेंद्र कुंडू 
जींद। ललीतखेड़ा गांव में बुधवार को पूनम मलिक के खेत पर महिला किसान खेत पाठशाला का आयोजन किया गया। महिलाओं ने पाठशाला में कीट सर्वेक्षण के बाद कीट बही खाता तैयार किया। पाठशाला के आरंभ में महिलाओं ने 6 ग्रुप बनाकर 10-0 पौधों पर कीटों का सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के बाद महिलाओं ने जामुन के पेड़ के नीचे बैठकर चार्ट पर कीटों के आंकड़े तैयार किए। मास्टर ट्रेनर अंग्रेजो ने सर्वेक्षण के बाद तैयार किए गए आंकड़ों की तरफ  इशारा करते हुए बताया कि कपास के इस खेत में इस सप्ताह शाकाहारी कीटों की संख्या नामात्र है। इस सप्ताह फसल में लाल व काला बाणिया ही नजर आए हैं। ये कीट कपास के अंदर से बीज का रस चूसते हैं। सविता ने महिलाओं को बताया कि अब तक पाठशाला में आने वाली किसी भी महिला ने अपने खेत में एक बूंद भी जहर का छिड़काव नहीं किया है। उन्होंने बताया कि महिलाओं ने बिना किसी कीटनाशक का प्रयोग किए कपास की अच्छी पैदावार ली है। इन महिलाओं की पैदावार कीटनाशकों का प्रयोग करने वाले अन्य किसानों के बराबर ही खड़ी है। पूनम मलिक ने बताया कि जब बिना कीटनाशक के हमें अच्छी पैदावार मिल सकती है तो फिर हमें अपनी फसल में जहर के प्रयोग की जरूरत क्यों पड़ती है। सविता ने बताया कि अधिक कीटनाशकों के प्रयोग से पर्यावरण, जमीन व पानी दूषित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर फसलों में इसी तरह कीटनाशकों का प्रयोग होता रहा तो हमारी आने वाली पीढिय़ों के लिए बहुुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। सविता ने बताया कि हमें कीटनाशकों की तरफ ध्यान न देकर पौधों की पर्याप्त खुराक की तरफ ध्यान देना चाहिए। पौधों को अच्छी खुराक देकर ही अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। महिलाओं ने बताया कि उनके लिए बड़ी खुशी की बात है कि उन्होंने अपनी मेहनत के बलबूते खुद का ज्ञान पैदा कर कीटनाशकों को धूल चटा दी है।
 खेत में कीट निरीक्षण के बाद बही खाता तैयार करती महिलाएं। 


लाल नहीं हो रहे भ्रष्टाचारियों के हाथ


विजीलैंस के पास हर वर्ष कम आ रही हैं भ्रष्टाचार की शिकायतें

नरेंद्र कुंडू 
जींद। एक तरफ तो देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है लेकिन दूसरी तरफ भ्रष्टाचार की शिकायतों में लगातार कमी आ रही है। यह बात सुनने में थोड़ी अटपटी जरूर लगती है लेकिन जिला विजीलैंस कार्यालय से मिले आंकड़े इसी बात की तरफ इशारा कर रहे हैं। जिला विजीलैंस की टीम के पास हर वर्ष भ्रष्टाचार के मामलों की शिकायतें कम होती जा रही हैं। राज्य चौकसी ब्यूरो के जिला कार्यालय में 2010 में रिश्वतखोरी के 6 मामले आए थे। वर्ष 2011 में ये मामले कम हो कर 4 हो गए और जनरवरी 2012 से अक्तूबर तक सिर्फ 2 ही मामले विजीलैंस कार्यालय के पास पहुंचे हैं।
इसे आम आदमी में जागरूकता का अभाव कहें या भ्रष्टाचारियों की सतर्कता जिस कारण राज्य चौकसी ब्यूरो की टीम भ्रष्टाचारियों पर नकेल डालने में नाकाम हो रही है। देश में भ्रष्टाचार भले ही गहराई में अपनी जड़ें जमा चुका हो लेकिन भ्रष्टाचारियों के हाथ लाल होने के मामले घटते ही जा रहे हैं। विजीलैंस की टीम भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने के लिए लोगों को जागरूक करने के लिए रिश्वत न देने व रिश्वतखोरों की शिकायत के लिए सरकारी कार्यालयों के बाहर सूचना बोर्ड लगवाकर मुहिम चला रही है, लेकिन इसके बावजूद भी विजीलैंस टीम के पास रिश्वतखोरी की शिकायत के मामले बढऩे की बजाए हर वर्ष कम होते जा रहे हैं। रिश्वतखोरी की शिकायत पर विजीलैंस की टीम द्वारा 2010 में 6 रैड डाली गई थी लेकिन 2011 में यह आंकड़ा कम होकर 4 पर और जनवरी 2012 से अक्तूबर तक सिर्फ 2 ही मामले विजीलैंस कार्यालय पहुंचे हैं। विजीलैंस के पास रिश्वतखोरी की कम हो रही शिकायतों से दो बातें साफ हो रही हैं। पहला यह कि लोग किसी पचड़े में पडऩे की बजाए चुपचाप रिश्वत देकर अपना काम निकलवाने में विश्वास रखते हैं और दूसरा यह कि रिश्वतखोरों ने विजीलैंस की टीम की आंखों में धूल झोंकने के लिए कोई नया रास्ता इख्तयार लिया है।

गवाह भी दे जाता ऐन वक्त पर धोखा

गवाह द्वारा कोर्ट में गवाही से मुकर जाने के कारण भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे अधिकतर सरकारी कर्मचारी व अधिकारी बिना किसी परेशानी के भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हो जाते हैं। क्योंकि कोर्ट की लंबी प्रक्रिया के दौरान आरोपी गवाह पर या तो सामाजिक दबाव बनवाकर गवाह को झुकने के लिए मजबूर कर देता या फिर पैसे का लालच देकर उसे तोड़ देता है। गवाह द्वारा ऐन वक्त पर गवाही से मुकरने के कारण कोर्ट में विजीलैंस की टीम की फजिहत होती है।

गवाही से मुकरने वालों के खिलाफ भी हो कार्रवाई

लोग भ्रष्टाचार के मामलों को सीरियस नहीं लेते हैं। विभाग द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिए सभी सरकारी कार्यालयों के बाहर रिश्वत ने देने व रिश्वत मांगने वालों की शिकायत के लिए सूचना बोर्ड भी लगवाए गए  हैं। लेकिन इसके बाद भी लोगों में कोई जागरूकता नहीं आ रही है। अधिकतर मामलों में गवाह कोर्ट में मुकर जाते हैं और आरोपी आराम से कोर्ट से बरी हो जाता है। कोर्ट में गवाही से मुकरने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई करने का प्रावधान होना चाहिए।
देवीलाल, इंस्पैक्टर 
राज्य चौकसी ब्यूरो, जींद

किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की कवायद

किसानों को 50 प्रतिशत सबसिडी पर दिया जाएगा लहसुन का बीज

नरेंद्र कुंडू
जींद। बागवानी विभाग द्वारा किसानों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने के लिए एक खास योजना तैयार की गई है। इस योजना के तहत विभाग किसानों को परम्परागत खेती से हटकर मसालेदार फसलों की खेती के लिए प्रेरित करेगा। विभाग द्वारा किसानों को मसालेदार फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत किसानों को सबसिडी पर बीज मुहैया करवाया जाएगा। योजना को अमल में लाने के लिए विभाग द्वारा जिले में 40 हैक्टेयर में उन्नत किस्म की लहसुन की फसल की बिजाई का टारगेट रखा गया है। इसके लिए विभाग द्वारा जिले के किसानों को 50 प्रतिशत सबसिडी पर लहसुन का बीज उपलब्ध करवाया जाएगा।
कम हो रही कृषि जोत व महंगाई के कारण खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बन रही है। इसके चलते किसान लगातार कर्ज के दलदल में धंसता जा रहा है। अब किसानों को इस दलदल से बाहर निकालने का बीड़ा बागवानी विभाग ने उठाया है। बागवानी विभाग ने किसानों को परम्परागत खेती से हटकर मसालेदार फसलों की खेती के लिए प्रेरित करने की योजना बनाई है। ताकि किसान परम्परागत खेती से आगे बढ़कर खेती को व्यवसाय के तौर पर अपनाकर आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें। बागवानी विभाग द्वारा किसानों का रूझान मसालेदार फसलों की खेती की तरफ बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत किसानों को 50 प्रतिशत सबसिडी पर उन्नत किस्म का बीज मुहैया करवाया जाएगा। योजना को धरातल पर उतारने के लिए विभाग ने इस बार जिले में 40 हैक्टेयर में लहसून की फसल की बिजाई का टारगेट निर्धारित किया है। इसके लिए विभाग किसानों को 50 प्रतिशत सबसिडी पर लहसून का बीज उपलब्ध करवा रहा है। बीज पर सबसिडी देने के अलावा विभाग किसानों को फसल की बिजाई का खर्च भी वहन करेगा। विभाग द्वारा किसान को फसल की बिजाई का खर्च प्रति हैक्टेयर के अनुसार दिया जाएगा। इसमें विभाग द्वारा प्रति हैक्टेयर पर किसान को 5312 रुपए की राशि मुहैया करवाई जाएगी।

लहसुन के भावों में हो सकती है बढ़ोतरी

बागवानी विभाग के कार्यालय में बीज प्राप्त करते किसान। 
मंडी के जानकारों का मानना है कि इस बार लहसुन के भाव में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। पिछले 2 वर्षों से लहसून के भाव में गिरावट बनी हुई है और गिरावट के बाद फसल के भावों में उछाल आने के ज्यादा आसार रहते हैं।

इनपुट के लिए दी जाएगी आर्थिक सहायता 

विभाग ने किसानों को मसालेदार फसलों की खेती के लिए प्रेरित करने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 50 प्रतिशत सबसिडी पर लहसून का उन्नत बीज मुहैया करवाया जा रहा है। बीज के अलावा विभाग द्वारा लहसून की बिजाई के लिए किसान को आर्थिक सहायता भी दी जाएगी। ताकि किसान पर फसल की बिजाई के दौरान किसी प्रकार का आर्थिक बोझ न पड़े।
डा. बलजीत भ्यान
जिला बागवानी अधिकारी, जींद



बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

पौधों के पास सुरक्षा के लिए होते हैं सुगंध रूपी अस्त्र व शस्त्र


कीटों से ज्यादा ताकतवार होते हैं पौधे

खाप प्रतिनिधियों ने किसान-कीट विवाद पर किया गहन मंथन

नरेंद्र कुंडू 
जींद। किसानों से ज्यादा ताकतवर कीट हैं और कीटों से ज्यादा ताकतवर पौधे हैं। किसानों के लिए कीटों को नियंत्रित करना मुश्किल है लेकिन पौधे कीटों को आसानी से काबू कर लेते हैं। पौधे सुगंध छोड़कर अपनी आवश्यकता के मुताबिक ही कीटों को बुलाते हैं और आवश्यकता पूरी होने पर अलग प्रकार की गंध छोड़कर कीटों को आसानी से भगता देते हैं। यह बात कृषि विभाग के अधिकारी डा. सुरेंद्र दलाल ने मंगलवार को निडाना गांव में किसान-कीट विवाद की सुनवाई के लिए आए विभिन्न खाप प्रतिनिधियों के समक्ष रखी। इस अवसर पर विवाद की सुनवाई के लिए किसान खेत पाठशाला में दलाल खाप के प्रधान एवं कृषि विभाग से सेवानिवृत्त एस.डी.ओ. भूप सिंह दलाल, तोमर खाप के प्रतिनिधि सुरेश कुमार तोमर, गांव मांडोठी (सोनीपत) के सरपंच रामचंद्र तथा एक मासिक पत्रिका के संपादक जसबीर मलिक भी मौजूद थे। बैठक में खाप प्रतिनिधियों ने किसान-कीट विवाद पर गहन मंथन किया।
डा. दलाल ने कहा कि पौधों के पास अपनी सुरक्षा के लिए न हाथ-पैर होते हैं और न देखने के लिए आंखें। पौधों के पास तो केवल उनके द्वारा छोड़ी जाने वाली सुगंध व गंध ही उनके लिए अस्त्र व शस्त्र का काम करती है। जब पौधे बढ़े हो जाते हैं और उनके निचले पत्तों को भोजन बनाने के लिए पर्याप्त धूप नहीं मिल पाती तो पौधे एक विशेष किस्म की सुंगध छोड़कर शाकाहारी कीटों को निमंत्रण देते हैं। इसके बाद शाकाहारी कीट पौधे के ऊपरी भाग के पत्तों को खाकर बीच से छेद देते हैं। इस प्रकार कीटों द्वारा पत्तों के बीच में किए गए छेद से नीचे के पत्तों पर धूप पहुंच जाती है और वे भी पौधे के लिए भोजन बनाने का काम करते हैं। मास्टर ट्रेनर मनबीर रेढ़ू ने बताया कि वैज्ञानिकों के तर्क के अनुसार कपास की फसल में अगर सफेद मक्खी की औसत प्रति पत्ता 6, हरा तेले की प्रति पत्ता 2 व चूरड़े की प्रति पत्ता 10 औसत आने लगे तो समझना चाहिए कि ये कीट फसल में नुक्सान पहुंचाने के स्तर पर पहुंच चुके हैं। लेकिन यहां के किसानों ने 31 जुलाई से लेकर 15 अगस्त तक के बीच के जो आंकड़े जुटाएं हैं उनमें कहीं भी ये कीट वैज्ञानिकों की इस लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघ पाए हैं। रेढ़ू ने प्रयोगरत खेत के किसान का उदहारण खाप प्रतिनिधियों के समक्ष रखते हुए बताया कि इस 5 कनाल जमीन में अभी तक किसान ने बिना किसी कीटनाशक के प्रयोग से दो चुगवाई में 9 मण कपास प्राप्त कर ली है और जिसकी अभी ओर भी चुगवाई बाकी है। 

कीटनाशकों के प्रयोग से क्यों बढ़ती है कीटों की संख्या

निडाना में किसान खेत पाठशाला में भाग लेते किसान। 
भैण से आए एक किसान बलवान ने बताया कि जब किसान फसल में कीटनाशक का छिड़काव करता है तो कीट अपने वंश को बचाने के चक्कर में अपना जीवनकाल छोटा कर अपनी प्रजनन क्रियाएं तेज कर देते हैं। इसके अलावा कीटनाशक के प्रयोग के बाद पौधों की सुगंध छोडऩे की प्रक्रिया भी गड़बड़ा जाती है। इससे भ्रमित होकर एक साथ विभिन्न प्रकार के कीट फसल में आ जाता हैं। 


सावधान! कहीं आस्था पर भारी ना पड़ जाए लालच की मार


छले वर्ष कुट्टू के आटे से हुई घटनाओं के बाद भी नींद से नहीं जागा प्रशासन

नरेंद्र कुंडू
जींद।पिछले वर्ष नवरात्रों में कुट्टू के आटे ने जमकर तांडव मचाया था। स्वास्थ्य विभाग विभाग की सुस्ती का खामियाजा हजारों श्रद्धालुओं को भुगतना पड़ा था। पिछले वर्ष कुट्टू का आटा खाने से हुई घटनाओं से इस बार भी जिला प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया है। माता के नवरात्रे शुरू हो चुके हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग गहरी नींद में है। गत वर्ष हजारों को दर्द देने वाला यह आटा इस वर्ष भी बाजार में बिकने के लिए बेताब है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग लकीर का फकीर बना हुआ है। अभी तक प्रशासन ने आटे के सैंपल लेने तक की जहमत नहीं उठाई है। जिला प्रशासन की इस लापरवाही के कारण इस वर्ष भी व्यापारी करोड़ों की चांदी कूटकर हजारों श्रद्धालुओं को जख्म देकर साफ निकल जाएंगे और बाद में विभाग के पास सिर्फ लकीर पिटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। 
माता के नवरात्रे शुरू हो चुके हैं और जिले में नवरात्रों की तैयारियां जोरों पर हैं। कुट्ट के आटे का बाजार सज चुका है और श्रद्धालुओं ने नवरात्रों के लिए कुट्ट के आटे की खरीदारी भी शुरू कर दी है। प्रदेश में पिछले वर्ष कुट्टू के आटे ने जमकर अपना असर दिखया था। पिछले वर्ष प्रदेशभर में कुट्टू का आटा खाने से सैंकड़ों श्रद्धालुओं के बीमार होने के मामले प्रकाश में आए थे। बाद में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही जनता के सामने उजागर होने के बाद विभाग ने आनन-फानन में कई जगह छापेमारी भी की थी, लेकिन तब तक जहर रुपी आटा अपना असर दिखा चुका था। व्यापारियों ने अपने मुनाफे के लालच में पुराना आटा बेचा था। पिछले वर्ष हुए घटनाक्रम के बाद भी अभी तक स्वास्थ्य विभाग की नींद नहीं टूटी है। नवरात्रे शुरू हो चुके हैं और स्वास्थ्य विभाग ने आटे की जांच के लिए सैंपल लेने तक का कष्ट नहीं उठाया है। शायद इस बार भी प्रशासन को माता के भक्तों का अस्पताल पहुंचने का इंतजार है। 

क्यों बदनाम है कुट्टू

दवाओं में इस्तेमाल होने वाला कुट्टू अपने रासायनिक व्यवहार के कारण बदनाम है। चिकित्सकों के अनुसार कुट्ट का आटा गर्म होता है। इससे शरीर में कार्बोहाइड्रेट और ग्लूकोज का स्तर बढ़ता है। कुट्टू में वसा अधिक होती है। इस आटे को अधिकतम एक माह तक उपयोग में लाया जा सकता है। ज्यादा दिन रखने से आटे में बैक्टीरिया और फंगस लग जाते हैं। कुट्टू का आटा ज्यादा दिनों तक रखे होने की स्थिति में माइक्रोटाक्सिन का निर्माण हो जाता है, जोकि शरीर के लिए हानिकारक है। खराब कुट्टू के आटे को खाने से उल्टी के साथ चक्कर आने लगते हैं। बेहोशी भी आ सकती है। शरीर ढीला पडऩे लगता है। ज्यादा दिनों तक रखे कुट्टू के आटे से बने पकवान खाने से लोग फूड प्वाइजनिंग के शिकार होते हैं। सही मायने में कुट्टू का आटा खाने से लोगों के अस्पताल तक पहुंचने के जिम्मेदार वो फैक्ट्री वाले हैं, जो खराब कुट्टू को पीसकर आटा बाजार में बेचते हैं। वे लोग जिम्मेदार हैं, जो ठीक से इस आटे की पैकिंग नहीं करते। नमीं के संपर्क में आने पर इस आटा में रासायनिक क्रियाएं होती हैं और यह जहर बन जाता है। 

आस्था से खिलवाड़

व्यापारी चंद पैसे के लालच में कुट्ट के आटे में व्रत के वर्जित आटा मिलाते हैं। कुट्ट का ब्रांडेड आटा बाजार में 70 से 80 रुपए किलो तक आता है। आम आटा 20 से 30 रुपए किलो में उपलब्ध है। ऐसे में व्यापारी चांदी कुटने के चक्कर में महंगे आटे में सस्ता आटा मिलाकर कमाई करते हैं। इस प्रकार व्यापारी अपने स्वार्थ की पूॢत के लिए श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ करते हैं। 

मैं अभी मीटिंग में हूं

अभी तक बाजार में कुट्टू का आटा नहीं आया था। इसलिए इसके सैंपल नहीं लिए गए हैं। मैं अभी चंडीगढ़ मीङ्क्षटग में हूं। मीङ्क्षटग से आने के बाद टीम का गठन कर सैंपलिंग का काम किया जाएगा। 
एन.डी. शर्मा
फूड सैफ्टी इंस्पैक्टर, जींद

स्टेज तक खींच लाया शौक और जनसमर्थन ने दिया हौंसला


दर्शकों की कमी के कारण स्टेज से मुहं मोडऩे लगे हैं रामलीला के कलाकार
नरेंद्र कुंडू
जींद। शौक उन्हें स्टेज तक खींच लाया और जनसमर्थन ने दिया हौंसला लेकिन अब दर्शकों की कमी के कारण रामलीला के कलाकार रामलीला से मुहं मोडऩे लगे हैं। रामलीला के मंच पर खड़े कलाकारों के लिए मैदान में मौजूद दर्शकों की भीड़ ही एनर्जी का काम करती थी। मैदान में दर्शकों की संख्या जितनी ज्यादा होती थी कलाकार उतने ही अधिक हौंसले के साथ अपने किरदार का मंचन करते थे। मंचन के दौरान दर्शकों की तालियां व किलकारियां कलाकारों के लिए फास्ट रिलिफ का काम करती और कलाकार अपनी सारी थकान को भूलकर पूरी तरह से अपने अभिनय में खो जाते थे। दर्शकों की संख्या जितनी ज्यादा होती थी कार्यक्रम भी उतना ही ज्यादा लंबा होता चला जाता था और कलाकारों को पता ही नहीं चलता था कि कब रात बीती व कब सुबह हुई। लेकिन आधुनिकता के दौर में बढ़ते मनोरंजन के साधनों ने कलाकारों से उनकी यह संजीवनी छीन ली। बदलती मानसिकता व बढ़ते मनोरंजन के साधनों के कारण रामलीला से लोगों का मन हटने लगा। दर्शकों ने रामलीला से ऐसा मन मोड़ा कि कलाकारों के हौंसले जवाब दे गए और उनका शौक खत्म होता चला गया। बदलती मानसिका के कारण कलाकारों के हुनर का जादू भी दर्शकों को अपनी तरफ नहीं खींच पाया। इस प्रकार दर्शकों की बेरूखी के कारण कई-कई वर्षों से रामलीला के मंचन में लगे कलाकार भी थक हार कर स्टेज छोड़ने पर मजबूर हो गए।
श्री सनातन धर्म आदर्श रामलीला (किला) में फिलहाल रावण का किरदार निभाने वाले विक्की परूथी का कहना है कि वे पिछले 12 वर्षों से रामलीला में कलाकार की भूमिका निभा रहे हैं। इस दौरान वे मेघनाथ, परशुराम का किरदार निभा चुके हैं। उनके पिता जी रामलीला में सेवा करते थे और उन्ही से प्रेरित होकर वे भी रामलीला में आए। जिस समय उन्होंने रामलीला के मंच से पर कदम रखा उस वक्त दर्शकों की संख्या काफी ज्यादा होती थी। दर्शकों की संख्या के कारण ही उनका उत्साह बढ़ता था लेकिन बदलते परिवेश के कारण दर्शकों ने भी रामलीला से मुहं मोडऩा शुरू कर दिया। 

 राम की वेशभूषा में सजा विनय अरोड़ा का फाइल फोटो। 



विनय अरोड़ा ने बताया कि उसे 1985 में पहली बार रामलीला के मंच पर आने का अवसर मिला था। इस दौरान उसे रामलीला में सीता का किरदार निभाया था। विनय ने बताया कि उनके पिता जी अमृतलाल अरोड़ा रामलीला में राम का किरदार निभाते थे। अपने पिता जी के किरदार के कारण ही उनके अंदर भी रामलीला में मंचन का शोक पैदा हुआ। जिसके बाद उन्होंने लगातार 10-12 वर्षों तक रामलीला में राम, लक्ष्मण, सीता व अन्य कई प्रकार के किरदार किए। इसके अलावा उनकी फिल्मों में जाने की भी तीव्र इच्छा थी और जींद में रामलीला के अलावा दूसरा कोई प्लेटफार्म नहीं था। इसलिए भी उसने अपने हुनर को तरासने के लिए रामलीला को चूना था। लेकिन बाद में दर्शकों की विमुखता के कारण उनका मन भी इससे हटने लगा और उन्होंने 1998 के बाद से रामलीला के किरदार छोड़ कर स्टेज का कामकाज संभाल लिया। 
नीरज शर्मा ने बताया कि वह शहर के कठियाना मौहल्ले में रामलीला के आयोजन में अहम भूमिका निभाता था। रामलीला के डायरेक्टर की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ रामलीला में राम, शत्रुघन, शंकर व अन्य छोटे किरदार निभाता था। जिस समय उन्होंने रामलीला के मंच पर पैर रखा था उस समय रामलीला देखने के लिए दर्शकों में काफी उत्साह होता था। दर्शकों के उत्साह के कारण ही उनका हौंसला बढ़ता था लेकिन बाद में रामलीला से दर्शकों का मन भरने के कारण उनका हौंसला भी जवाब दे गया। 
राम की वेशभूषा में सजे कलाकार नीरज शर्मा का फाइल फोटो। 
कपिल मिनोचा ने बताया कि उसने रामलीला के मंच पर जौकर के किरदार से शुरूआत की। जब उन्होंने पहली बार स्टेज पर कदम रखा तो दर्शकों की संख्या को देखकर उनके पैर कांपने लगे और वे बीच में ही मंच छोड़कर भाग गए। बाद में मुकेश उर्फ मुकरी ने उनका हौंसला बढ़ा कर उसके अंदर बैठे डर को बाहर निकाला। इसके बाद तो उन्होंने लगभग 13 वर्षों तक रामलीला में राम, खेवट, भरत सहित कई किरदार निभाए तथा दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। लेकिन दर्शकों की कमी के कारण ही उन्होंने रामलीला में किरदार छोड़कर स्टेज को संभालने में लग गए। 

सबसे मुश्किल होता है कॉमेडियन का किरदार

मंच पर हास्य कलाकार की भूमिका में मुकेश उर्फ मुकरी का फाइल फोटो। 


रामलीला के मंच पर लगभग चार दशकों तक दर्शकों का मनोरंजन कर दर्शकों के दिलों पर अपने हुनर की छाप छोडऩे वाले मुकेश उर्फ मुकरी का कहना है कि किसी भी कार्यक्रम में सबसे मुश्किल काम हास्य कलाकार का होता है। क्योंकि हास्य कलाकार के अलावा और जो भी किरदार होते हैं उन सभी के डायलॉग या संवाद पहले से ही लिखे होते हैं। लेकिन हास्य कलाकार को अपने डायलॉग स्वयं स्टेज पर खड़े होकर दर्शकों के चेहर को देखकर तैयार करने होते हैं। एक हाजिर जवाब कलाकार ही हास्य कलाकार की भूमिका निभा सकता है। मुकेश ने बताया कि जिस दिन रामलीला मैदान में दर्शकों की ज्यादा भीड़ होती उस दिन उतनी ही अच्छी कॉमेडी होती थी। दर्शकों के चेहर को देखकर उनके अंदर जोश भर जाता था लेकिन दर्शकों की बेरूखी ने ही उनसे उनका यह हुनर उनसे छीन लिया।