Wednesday, 12 September 2012

कीट ज्ञान के साथ-साथ पौधों की भाषा भी सीखें किसान


किसान-कीट विवाद की सुनवाई के दौरान किसानों ने पर्णभक्षी कीटों पर गहनता से की चर्चा


नरेंद्र कुंडू 
जींद। जिले के निडाना गांव में मंगलवार को किसान-कीट विवाद की सुनवाई के लिए खाप पंचायत की 12वीं बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता बराह कलां बारहा खाप के प्रधान कुलदीप ढांडा ने किया। इस अवसर पर किसान खेत पाठशाला में अलेवा खाप के प्रतिनिधि राजेंद्र दलाल तथा राज्यान खाप के प्रतिनिधि राजबीर सिंह राज्यान विशेष रूप से मौजूद रहे। खेत पाठशाला में किसानों ने कीट सर्वेक्षण के बाद कपास की फसल में मौजूद पर्णभक्षी कीटों तथा कपास की फसल में हुई अल्ल की शुरुआत पर गहनता से चर्चा की। कीट सर्वेक्षण के बाद किसानों ने कीट बही-खाता भी तैयार किया। कीट-बही खाते में निडाना, निडानी, ललीतखेड़ा, चाबरी, खरक रामजी, ईगराह, राजपुरा, सिवाहा सहित आस-पास के 12 गांवों से आए किसानों ने अपने-अपने खेत से तैयार किए गए कीटों के आंकड़े भी दर्ज करवाए।

खाप प्रतिनिधियों के समक्ष कीट-बही खाता प्रस्तुत करते किसान।


 बैठक में मौजूद किसान।

बैठक में किसान-कीट विवाद की सुनावाई के दौरान राजपुरा गांव से आए किसान बलवान ने खाप प्रतिनिधियों के समक्ष कीटों का पक्ष रखते हुए बताया कि कीटों के बिना पौधों की वंशवृद्धि संभव नहीं है। पौधों को अपना जीवनचक्र चलाने के लिए शाकाहारी व मासाहारी दोनों प्रकार के कीटों की जरुरत होती है। इसलिए हमें कीट ज्ञान के साथ-साथ पौधों की भाषा भी सीखने की भी जरुरत है। बलवान ने बताया कि पौधे समय-समय पर अपनी जरुरत के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की सुगंध छोड़कर मासाहारी व शाकाहारी कीटों को अपनी सुरक्षा के लिए बुलाते हैं। किसान सुरेश ने बताया कि हमें अपनी फसल में आने वाले शाकाहारी व मासाहारी कीटों की गतिविधियां व उनके क्रियाकलापों को गहनता से समझना चाहिए। सुरेश ने बताया कि यहां के किसान अब तक पत्ते खाने वाले 13 किस्म के पर्णभक्षी कीटों की पहचान कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि फिलहाल कपास की फसल में पत्ते खाने वाले (पर्ण क्षी) कीटों की तादात बढ़ रही है, क्योंकि इस समय कपास के पौधों को पर्णभक्षी कीटों की मदद की सबसे ज्यादा जरुरत है। सुरेश ने बताया कि इस समय कपास की फसल काफी विकसित हो चुकी है और फसल में फूल व फल भी आने लगा है। इसलिए पौधों को फल व फूलों के लिए पर्याप्त भेजन उपलब्ध करवाने के लिए अधिक भेजन की आवश्यकता पड़ती है और पत्ते पौधे के लिए भेजन बनाने का कार्य करते हैं। पत्तों को भेजन बनाने के लिए धूप की सबसे ज्यादा जरुरत होती है। किसान महाबीर ने बताया कि इस समय कपास के पौधे काफी विकसित हो चुके हैं, जिस कारण पौधे के नीचे के पत्तों को ऊपरी भाग के पत्तों ने पूरी तरह से ढक लिया है और नीचे के पत्तों तक पर्याप्त मात्रा में धूप नहीं पहुंच पाती है। जिस कारण नीचे के पत्ते पौधे के लिए भेजन नहीं बना पा रहे हैं। इसलिए पौधे ने नीचे के पत्तों तक धूप पहुंचाने के लिए पर्णभक्षी कीटों से मदद की गुहार लगाई है। पर्णभक्षी कीट पौधे के ऊपरी पत्तों को बीच से खा कर उसमें छेद कर देते हैं और इस छेद से नीचे के पत्तों तक धूप पहुंच जाती है। इस प्रकार पर्णक्षी कीटों की मदद से नीचे के पत्तों पर भी सही ढंग से प्रकाश संशलेषण होता है। जिस कारण नीचे व ऊपरी भाग के पत्ते मिलकर पौधे के लिए भेजन बनाते हैं। जिससे फल व फूलों को पूरी खुराक मिलती है और इससे उत्पादन में इजाफा होता है। खरकरामजी के किसान रोशन ने बताया कि इस समय कपास की फसल में अल्ल की शुरुआत हो चुकी है। रोशन ने बताया कि अल्ल बिल्कुल छोटे प्रकार का शाकाहारी कीट होता है और इसके पिछवाड़े पर दो सिंग भी होते हैं। लेकिन किसानों को इससे डरने की जरुरत नहीं है, क्योंकि अल्ल के साथ-साथ उसके खात्मे के लिए फसल में लेडी बिटल व सिरफड मक्खियां अपने आप ही पहुंच जाएंगी। बर्शत किसान ने अपनी फसल में किसी प्रकार के कीटनाशक का इस्तेमाल ना किया हो। किसानों ने बैठक में अपने अनुभव रखते हुए बताया कि उन्होंने सर्वेक्षण के दौरान मकड़ी द्वारा पुष्पाहारी तेलन, इंजनहारी, सलेटी भूड, लाल बाणिया को खाते हुए देखा। हथजोड़ा तेलन, सलेटी भूड, मिलीबग व सुंडियों को चट कर रहा था। लोपा मक्खी पतंगा व मच्छरों का खात्मा कर रही थी। पाठशाला के समापन के बाद किसानों ने विभिन्न खापों से आए प्रतिनिधियों को हथजोड़े का चित्र स्मृति चिह्न के तौर पर देकर उनका स्वागत किया।  

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