*बर्फानी ढलान पर एक अंतहीन मोड़*
उत्तरकाशी के पहाड़ों में उस दिन बर्फ़ का तूफ़ान उम्मीद से कहीं ज़्यादा जल्दी आ गया था। 32 वर्षीय मानस, जो खुद को एक अनुभवी ट्रेकर मानता था, इस बार हिमालय के मिजाज को भांपने में चूक गया। कांपते हाथों और धुंधली पड़ती रोशनी के बीच, उसका पैर अचानक एक गीली चट्टान से फिसला। एक खौफनाक चीख घाटी में गूंज उठी। मानस कई सौ फीट नीचे एक गहरी खाई में गिरता चला गया। जब उसकी पीठ एक नुकीली चट्टान से टकराई, तो एक तीखा दर्द उसके पूरे वजूद में दौड़ गया, और चारों तरफ सिर्फ गहरा, अंतहीन अंधेरा छा गया। जब मानस की आँखें खुलीं, तो उसे न तो कड़ाके की ठंड महसूस हो रही थी और न ही हड्डियों को तोड़ देने वाला वो दर्द। हवा में जड़ी-बूटियों की एक सोंधी सी महक थी और सामने एक पवित्र धूनी (आग) जल रही थी। "अमृत पी लो, बेटा।" एक गहरी, शांत और गूंजती हुई आवाज मानस के कानों में पड़ी। उसने मुड़कर देखा—एक लंबी जटाओं, दाढ़ी मूंछ वाले, भस्म लपेटे दरम्याना कद के सिद्ध योगी उसकी तरफ देख रहे थे। उनकी आँखों में असीम करुणा थी और एक ऐसा तेज था जो सूरज को भी फीका कर दे। "मैं कहाँ हूँ? क्या मैं मर चुका ह...