मंगलवार, 29 नवंबर 2022

जगदीशचंद्र बसु – विज्ञान के आकाश में भारतीय पुरोधा

'पेड़ पौधों में भी जीवन होता है और उनमें भी अनुभूतियाँ होती है' इस बात को वैज्ञानिक आधार पर सिद्ध कर दुनियां को चौकाने वाले वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु का आज जन्म दिवस है. इनका जन्म 30 नवंबर 1858 को मेमनसिंह गाँव,बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ था. बसु जी प्रसिद्ध भौतिकवादी तथा पादपक्रिया वैज्ञानिक कहे जाते थे. बसु जी बचपन से ही बहुत विद्वान् और किसी न किसी क्षेत्र में रिसर्च करते रहते. जगदीश चंद्र बसु  ने कई महान ग्रंथ भी लिखे हैं, जिनमें से कुछ निम्न है - सजीव तथा निर्जीव की अभिक्रियाएँ ,वनस्पतियों की अभिक्रिया, पौधों की प्रेरक यांत्रिकी इत्यादि.  जगदीश चंद्र बसु ने सिद्ध किया कि चेतना केवल मनुष्यों और पशुओं, पक्षियों तक ही सीमित नहीं है, अपितु वह वृक्षों और निर्जीव पदार्थों में भी समाहित है. उन्होंने कहा कि निर्जीव व सजीव दोनों सापेक्ष हैं. उनमें अंतर केवल इतना है कि धातुएं थोड़ी कम संवेदनशील होती हैं. इनमें डिग्री का अंतर है परंतु चेतना सब में है. सर जगदीश चंद्र  सबसे प्रमुख पहले भारतीय वैज्ञानिकों में से एक हैं जिन्होंने प्रयोग करके साबित किया कि जानवर और पौधे दोनों में बहुत कुछ समान है। उन्होंने दिखाया कि पौधे गर्मी, ठंड, प्रकाश, शोर और विभिन्न अन्य बाहरी उत्तेजनाओं के प्रति भी संवेदनशील होते हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा एक स्थानीय स्कूल से प्राप्त की, क्योंकि उनके पिता का मानना था कि अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा का अध्ययन करने से पहले बोस को अपनी मातृभाषा, बंगाली सीखनी चाहिए। उन्होंने बी.ए. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डिग्री, लंदन विश्वविद्यालय से बीएससी की डिग्री और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से डीएससी की डिग्री। 1896 में, बोस ने ‘निरुदेशेर कहिनी’ लिखी, जिसे बंगाली विज्ञान कथा की पहली कृतियों में से एक माना जाता है।

 

बसु के प्रसिद्ध प्रयोग : लंदन में रॉयल सोसाइटी का केंद्रीय हॉल 10 मई, 1901 को प्रसिद्ध वैज्ञानिकों से खचाखच भरा था। हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक था कि बसु का प्रयोग कैसे प्रदर्शित करेगा कि पौधों में अन्य जीवित प्राणियों और मनुष्यों की तरह भावनाएँ होती हैं। बसु ने एक ऐसे पौधे को चुना जिसकी जड़ों को ब्रोमाइड के घोल वाले बर्तन में सावधानी से उसके तने तक डुबोया गया, जिसे जहर माना जाता है। उन्होंने प्लांट के साथ उपकरण में प्लग लगाया और एक स्क्रीन पर रोशनी वाले स्थान को देखा, जिसमें पौधे की गति दिखाई दे रही थी, जैसे कि उसकी नाड़ी धड़क रही थी, और स्पॉट एक पेंडुलम के समान गति करने लगा। मिनटों के भीतर, घटनास्थल हिंसक तरीके से हिल गया और अंत में अचानक बंद हो गया। सब कुछ लगभग एक जहरीले चूहे की तरह था जो मौत से लड़ रहा था। जहरीले ब्रोमाइड के घोल के संपर्क में आने से पौधे की मृत्यु हो गई थी। इस कार्यक्रम का बहुत सराहना और तालियों के साथ स्वागत किया गया. 

 

उन्होंने क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार किया, जो पौधों की वृद्धि को मापने के लिए एक उपकरण है उन्हें पौधों के तिसुएस में माइक्रोवेव की क्रिया का अध्ययन करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है बोस रेडियो तरंगों का पता लगाने के लिए सेमी कंडक्टर जंक्शन का उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे और उन्होंने विभिन्न माइक्रोवेव घटकों का भी आविष्कार किया। उन्होंने ऑटोमैटिक रिकॉर्डर का निर्माण किया जो पौधों में भी मिनट की गतिविधियों को दर्ज कर सकते हैं।

 

मारकोनी नहीं बसु है 'रेडियो तरंगों' के  प्रणेता: जगदीश चंद्र बसु ने सूक्ष्म तरंगों (माइक्रोवेव) के क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्य तथा अपवर्तन, विवर्तन और ध्रुवीकरण के विषय में अपने प्रयोग आरंभ कर दिये थे. लघु तरंगदैर्ध्य, रेडियो तरंगों तथा श्वेत एवं पराबैंगनी प्रकाश दोनों के रिसीवर में गेलेना क्रिस्टल का प्रयोग बसु  के द्वारा ही विकसित किया गया था. मारकोनी के प्रदर्शन से 2 वर्ष पहले ही 1885 में बसु ने रेडियो तरंगों द्वारा बेतार संचार का प्रदर्शन किया था. इस प्रदर्शन में जगदीश चंद्र बसु ने दूर से एक घण्टी बजाई और बारूद में विस्फोट कराया था. आजकल प्रचलित बहुत सारे माइक्रोवेव उपकरण जैसे वेव गाईड, ध्रुवक, परावैद्युत लैंस, विद्युतचुम्बकीय विकिरण के लिये अर्धचालक संसूचक, इन सभी उपकरणों का उन्नींसवी सदी के अंतिम दशक में बसु ने अविष्कार किया और उपयोग किया था.  बसु ने दुनिया के पहले 'हार्न एंटीना' की खोज की जो आज माइक्रोवेव आधारित सभी उपकरणों में इस्तेमाल किया जाता है. आज का रेडियो, टेलीविज़न, रडार, भूतलीय संचार रिमोट सेन्सिंग, माइक्रोवेव ओवन और इंटरनेट इन्हीं तरंगों के कारण चलते हैं. पौधों में वृद्धि की अभिरचना आज आधुनिक विज्ञान के तरीकों से सिद्ध हो गई है. पौधों में वृद्धि और अन्य जैविक क्रियाओं पर समय के प्रभाव का अध्ययन जिसकी बुनियाद बसु ने डाली, आज क्रोनोबायोलॉजी कही जाती है. अलग-अलग परिस्थियों में सेल मेम्ब्रेन पोटेंशियल के बदलाव का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुंचे कि पौधे संवेदनशील होते हैं, वे दर्द महसूस कर सकते हैं.

 

जीवन बड़ा नहीं सार्थक होना चाहिए: समस्त विश्व की तरह महात्मा गाँधी भी उनसे बहुत प्रभावित थे I उनके जीवनीकारों में से एक पैट्रिक गेडेज लिखते हैं कि 'जगदीश चंद्र बसु के जीवन की कहानी पर उन सभी युवा भारतीयों को गहराई और मजबूत विचारों के साथ गौर करना होगा, जिनका उद्देश्य विज्ञान या बौद्धिकता या सामाजिक भावना के महती लक्ष्यों को साकार करना है'. बोस एक अच्छे शिक्षक भी थे, जो कक्षा में पढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रदर्शनों का उपयोग करते थे। बोस के ही कुछ छात्र जैसे सतेन्द्र नाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री बने। वर्ष 1917 में जगदीश चंद्र बोस को "नाइट" (Knight) की उपाधि प्रदान की गई तथा शीघ्र ही भौतिक तथा जीव विज्ञान के लिए रॉयल सोसायटी लंदन के फैलो चुन लिए गए। बोस ने अपना पूरा शोधकार्य बिना किसी अच्छे (महगे) उपकरण और प्रयोगशाला के किया था. इसलिये जगदीश चंद्र बोस एक अच्छी प्रयोगशाला बनाने की सोच रहे थे। "बोस इंस्टीट्यूट" (बोस विज्ञान मंदिर) इसी सोच का परिणाम है जो कि विज्ञान में शोधकार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केन्द्र है। बसु ने ही सूर्य से आने वाले विद्युत चुम्बकीय विकिरण के अस्तित्व का सुझाव दिया था जिसकी पुष्टि 1944 में हुई. जगदीश बसु ने मानव विकास की नींव डाली और मानव जीवन के लिए बहुत से सफल प्रयास किए. उनका 78 वर्ष की आयु में 23 नवंबर 1937 को गिरिडीह, भारत में निधन हो गया। शुद्ध भारतीय परंपराओं और संस्कृति के प्रति समर्पित जगदीश चंद्र बसु आज भी हम सभी की प्रेरणा है.     

डॉ. पवन सिंह  
 

(लेखक जे. सी. बोस विश्वविद्यालयफरीदाबाद के मीडिया विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है)

 

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में अंतर

भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आए हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म-कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्राय: भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालांकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आइये इस लेख के माध्यम से जानते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है?

ऋषि कौन होते हैं

भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं। ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किए ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसीलिए कहा गया है 'ऋषि तु मन्त्र द्रष्टारा न तु कर्तारÓ अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालांकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है। 

ऋषि शब्द का अर्थ 'ऋषÓ मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नजर भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ-साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ-साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे। 

ऋषियों के प्रकार

ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अत: यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात् ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमर सिंह द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि। 

सप्त ऋषि

पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमें अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है। 

मुनि किसे कहते हैं

मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दु:ख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं। मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हें मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि। 

मुनि शब्द का चित्र, मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीजें जो उज्जवल हैं, आकर्षक हैं और आश्चर्यजनक हैं वे चित्र हैं। अर्थात् संसार की लगभग सभी चीजें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ-साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात् मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मंत्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।

जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गई है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी), भाषा, एषणा (आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप (धार्मिक उपकरण व्यवहार में शुद्धि) प्रतिष्ठापना (मल मूत्र त्याग में सावधानी) का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं। मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं। 

साधु कौन होते हैं 

किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया। कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि 'साध्नोति परकार्यमिति साधु :-अर्थात् जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है। 

साधु के लिए यह भी कहा गया है 'आत्मदशा साधेÓ अर्थात् संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो सन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं। 


सन्यासी किसे कहते हैं

सन्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुड़ी नहीं है। वैदिक काल में किसी सन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्यासी या सन्यास की अवधारणा संभवत: जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्यासी माना गया है। सन्यासी शब्द सन्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अत: त्याग करने वाले को ही सन्यासी कहा जाता है। सन्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है। 

हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्यासियों का वर्णन है :- परिव्राजक: सन्यासी :- भ्रमण करने वाले सन्यासियों को परिव्राजक: की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजक: सन्यासी ही थे। 

परमहंस सन्यासी :- यह सन्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है। 

यति सन्यासी :- उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। 

वास्तव में सन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दु:ख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो सन्यासी कहलाता है। 

उपसंहार

ऋषि, मुनि, साधु या फिर सन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।


मंगलवार, 15 नवंबर 2022

खेलों के क्षेत्र में सोने की खान बनता हरियाणा

नरेंद्र कुंडू 

'देशां म देश हरियाणा, जित दूध-दही का खाना यह हरियाणा के दूध-दही का ही कमाल है कि जो यहां के खिलाड़ी खेलों के क्षेत्र में विश्व पटल पर भारत का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिख रहे हैं। खेल का मैदान हो या युद्ध का क्षेत्र हरियाणा के युवा हर जगह अपना परचम लहरा रहे हैं। आज खेलों के क्षेत्र में हरियाणा की एक अलग पहचान है। हरियाणा की माटी से निकले खिलाड़ी देश के लिए गोल्ड मैडल ला रहे हैं। हरियाणा अब खेलों का हब बन चुका है। कुश्ती का अखाड़ा हो चाहे कबड्डी का मैदान या फिर एथेलेटिक्स का ट्रैक हर क्षेत्र में हरियाणा के खिलाडिय़ों का दबदबा है। कुश्ती के अखाड़े में तो हरियाणा के पहलवानों का कोई तोड़ नहीं है। इसी प्रकार बॉक्सिंग के रिंग में भी हरियाणा के खिलाड़ी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गोल्डन पंच लगा रहे हैं। खेलों के क्षेत्र में हरियाणा का नाम आज अग्रीम पंक्ति में है।  

भारत के कुल क्षेत्रफल का केवल 1.4 प्रतिशत और देश की 2.1 प्रतिशत से कम आबादी के साथ भौगोलिक क्षेत्र के मामले में 22वें स्थान पर होने के बावजूद हरियाणा खेलों के क्षेत्र में नंबर वन राज्य के रूप में उभरा है। राष्ट्रीय स्तर हो या अंतर्राष्ट्रीय मंच, हरियाणा देश की पदक तालिका में अपने योगदान के मामले में अग्रणी रहा है। टोक्यो-2020 ओलम्पिक खेलों में भी हरियाणा का 50 प्रतिशत से अधिक मैडल का योगदान रहा है। हरियाणा ने भारत द्वारा जीते गए व्यक्तिगत पदकों में से आधे का योगदान दिया। 2016 के रियो ओलंपिक में भी हरियाणा ने भारत के पदकों में से आधे का योगदान दिया था। इसी तरह हरियाणा के खिलाडिय़ों ने 2018 एशियाई खेलों में भारत के कुल पदकों का लगभग एक-चौथाई और राष्ट्रमंडल खेलों में एक-तिहाई पदक जीते थे। इसी प्रकार गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित हुए राष्टï्रीय खेलों, स्पेन में आयोजित हुए अंडर-23 विश्व कुश्ती प्रतियोगिता, नेपाल में आयोजित हुई इंटरनैशनल पावर लिफ्टिंग प्रतियोगिता, इंग्लैंड में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2022, सर्बिया में आयोजित इंटरनैशनल गोल्डन ग्लोव्स टूर्नामेंट, भोपाल में हुई राष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता, गुजरात के भावनगर में आयोजित हुए 36वें राष्ट्रीय खेलों, बुल्गारिया में आयोजित अंडर-20 वल्र्ड रेसलिंग (कुश्ती) चैंपियनशिप में भी हरियाणा के खिलाडिय़ों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। हरियाणा की माटी से दिन-प्रतिदिन अनेकों खिलाड़ी निकल कर आगे आ रहे हैं। आज सही मायनों में हरियाणा खेलों के क्षेत्र में सोने की खान बनने की ओर अग्रसर है। युवाओं का खेलों के क्षेत्र में रुझान लगातार बढ़ता रहा है। हरियाणा की माटी देश को एक से बढ़कर एक अच्छा खिलाड़ी दे रही है। हरियाणा में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। कमी है तो बस उस प्रतिभा को पहचान कर तराशने की। क्योंकि आज खेलों के क्षेत्र में हरियाणा में आपार संभावनाएं हैं। 


    

 


भारतीय वैवाहिक व्यवस्था विश्व की सर्वश्रेष्ठ वैवाहिक व्यवस्था क्यों है


- डॉ उमेश प्रताप वत्स

भारतीय समाज में विवाह संबंधों को प्राण से भी बढ़कर महत्वपूर्ण माना जाता है। विश्व के अन्य देशों के लोग यह जानकर आश्चर्य चकित हो जाते हैं कि भारत के लोग किस तरह एक ही साथी के साथ पूरा जीवन गुजार देते हैं तभी तो यहाँ साथी को जीवन साथी कहकर बुलाया जाता है। 

यदि भावना से अलग होकर आकलन किया जाये तो सामाजिक जीवन में वैवाहिक परम्परा दो ज्ञात-अज्ञात महिला-पुरुष को इतने निकट संबंध में लेकर आता है कि बाकि सब संबंध गौण हो जाते हैं। यद्यपि माता-पिता, भाई-बहन व पुत्र-पुत्रियों का भी प्रगाढ़ अटूट संबंध है जिनका महत्व कदापि कम नहीं हो सकता और ये संबंध रक्त के साथ-साथ भावनात्मक भी है तथापि रचनात्मक रूप से विचारे तो मात-पिता का झुकाव अन्य बच्चों की ओर भी हो सकता है। भाई-बहन विवाह उपरांत अपने परिवार में ध्यान देने लगते हैं और बच्चें अपना परिवार होने पर व्यस्त हो जाते हैं। बस! एक पत्नी अथवा पति ही मरते दम तक गाड़ी के दो पहिये की तरह एक साथ मिलकर चलते हुए अपने जीवन की गाड़ी को अपने सपनों की दुनिया में ले जाने का अथक, अविराम निरंतर प्रयास करते ही रहते हैं। हिन्दुस्थान की वैवाहिक परम्पराओं का यदि अध्ययन किया जाये तो यह पृथ्वी लोक पर सर्वाधिक अद्भुत, सांस्कृतिक, परम्परागत, पवित्र, मनोरंजक एवं सामाजिक सुदृढ़ीकरण का सुन्दर संगम है एवं विश्व के लिए मार्गदर्शक भी।परिवार की सर्वाधिक सुदृढ़ कड़ी है भारतीय वैवाहिक व्यवस्था। फिर इस व्यवस्था को ओर अधिक प्रभावी, सुदृढ़ बनाने के लिए हमारे मनिषी, विद्वान महान आत्माओं ने सहस्रों वर्षों से अपना पूरा, ज्ञान, जीवन समर्पित कर दिया। पश्चिम व अन्य देशों में पुरुष को महिला के लिए तथा महिला को पुरुष के लिए आवश्यकता मानकर संबंधों को विकसित किया गया है जबकि हमारे देश में दोनों ससम्मान एक दूसरे के लिए जीवन-भर एक साथ जीने-मरने अर्थात् किसी भी मुसीबत का एक साथ मिलकर सामना करने हेतु संबंध में स्थापित हो जाते हैं। वैवाहिक संबंध पारिवारिक व्यवस्था के लिए आर्थिक प्रावधान के रूप में, आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, भावनात्मक आधार के रूप में, एक प्रभावशाली समूह के रूप में और सामाजिक विनियमन के एक साधन के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय परिवार व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता संयुक्त परिवार प्रणाली का अस्तित्व है जो विशुध्द वैवाहिक संबंधों से ओर अधिक दृढ़ होती है। संयुक्त परिवार की विशालता, संयुक्त संपत्ति का स्वामित्व, निवास साझा करना आदि व्यवस्थाएं एक संस्कारी दम्पत्ति पर ही निर्भर है। संयुक्त परिवार में यदि किसी भी दंपति से कोई त्रुटि हो जाये तो अन्य दम्पत्ति उसे तुरंत सुधार लेते हैं तभी संयुक्त परिवार हंसते-हंसते सफलतापूर्वक जीवन की गाड़ी को सरलता से लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। परंपरा प्रधान समाज में विवाह एक ऐसी धार्मिक और सामाजिक संस्था है जो किसी भी महिला और पुरुष को एक साथ जीवन व्यतीत करने का अधिकार देने के साथ-साथ दोनों को कुछ महत्वपूर्ण कर्तव्य भी प्रदान करती है। हमारे देश में विभिन्न प्रकार के विवाहों का बड़े पैमाने पर पालन किया जाता है। जैसे-जैसे समाज उन्नत हुआ है, विवाह विभिन्न परिवर्तनों से गुजरा है, जबकि कुछ चीजें स्थिर रहती हैं। यहां तक कि इससे जुड़े मूल्यों में भी अभूतपूर्व बदलाव आया है। समय परिवर्तनीय है तो इसका असर हर युग काल की गति के साथ वैवाहिक परम्पराओं पर पढऩा भी निश्चित था। किंतु भावनाएं नहीं बदलती। भारतीय महिला सतयुग में भी पति का हित चाहती थी, उसके सुख की कामना करती थी, अपने रिश्ते की पवित्रता का महत्व समझती थी और वर्तमान में आज भी वे सर्वप्रथम अपने पति के हित की, सुख की कामना करती हैं। निसंदेह भारत में विवाह और परिवार व्यवस्था में परिवर्तन और अविच्छिन्नता और वैश्वीकरण का प्रभाव देखने को मिलता है। वैश्वीकरण ने लोगों की अधिक गतिशीलता, और विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के बीच अधिक बातचीत को जन्म दिया है, जिससे लोगों के मूल्यों और संस्कृति पर प्रभाव पड़ा है। लोगों ने परम्परागत मर्यादाओं को लाँघने का प्रयास किया है। फलस्वरूप अधिकांश परिणाम भी नकारात्मक दिखाई दे रहे हैं। उदाहरण के लिए बड़े शहरों दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, बैंगलोर आदि में लिव-इन रिलेशनशिप विवाह पूर्व एक नया चलन है, ताकि साथी चुनते समय बेहतर निर्णय लिया जा सके। लिव-इन रिलेशनशिप में शारीरिक वासना की संतुष्टि हो सकती है। एक-दूसरे को समझने का अवसर भी मिल जाता है किंतु यदि एक-दूसरे को समझने के बाद विचार भिन्नता अथवा सामंजस्य न बैठाने की समस्या के कारण संबंध विच्छेद करने का निर्णय लेना पड़े तब अन्य किसी दूसरे संबंधों में भी सामंजस्य की समस्या उत्पन्न हो सकती है और फिर से ऐसा होने पर असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है। फलस्वरूप पार्टनर तनाव, विषाद का जीवन जीने लगते हैं। 

आज युवा शैक्षिक अवसरों की तलाश में तथा कैरियर के लिए परिवारों से दूर होते जा रहे हैं। 

युवा वर्ग की इस गतिशीलता ने पारिवारिक संबंधों को कमजोर कर दिया है। युवा अपने माता-पिता, घर में रह रहे बुजुर्गों का ध्यान नहीं रख पा रहे हैं। इससे आदर्श परिवार की धारणा टूटती दिखाई दे रही है। विदेशों की ओर भी युवाओं के रूख में आश्चर्यजनक वृद्धि दिखाई दे रही है। परिवार के ताने-बाने को विदेशों में जाने की यह ईच्छा छिन्न-भिन्न करती दिखाई दे रही है। यह विवाह प्रणाली के परिवर्तन में परिलक्षित हो रहा है। महिलाएं अब अधिक शिक्षित हैं एवं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, इसलिए घरेलू निर्णयों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यहां वैश्वीकरण के प्रभाव को आईटी से संबंधित नौकरियों में उत्कर्ष के रूप में देखा जा सकता है। महिलाएं इस क्षेत्र का एक बड़ा भाग हैं। शहरी क्षेत्रों में अच्छी तरह से नियोजित महिलाओं को आजीविका कमाने के साथ-साथ घर के कामों के दोहरे कर्तव्य को संभालने के लिए बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ता है।

दाम्पत्य संबंध और माता-पिता के बच्चे के संबंध- विवाहित पुरुष और महिलाएं अपनी रोजगार के कारण भिन्न स्थानों पर अलग-अलग रह रहे हैं। समाज में एकल माता-पिता भी पाए जाते हैं। न केवल वैवाहिक संबंध बल्कि माता-पिता-बच्चों के संबंधों में भी उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। अधिकांश कामकाजी दंपति परिवारों में, माता-पिता अपने बच्चों से मिलने और बातचीत करने के लिए समय नहीं दे पाते हैं, क्योंकि वें देर रात तक निजी कंपनियों में काम कर रही हैं। भौतिकता की इस दिशाहीन दौड़ में वें भी सम्मिलित हैं। 

पहले माता-पिता या अभिभावक बच्चों के लिए जीवन साथी का चयन करते थे किंतु वर्तमान में उदार मूल्यों के प्रभाव में, व्यक्तियों ने अपनी पसंद और नापसंद के अनुसार अपने स्वयं के साथी का चुनाव प्रारम्भ कर दिया है।

जीवन साथी के चयन की प्रक्रिया में एक नया चलन उभर रहा है जिसमें सोशल मीडिया डेटिंग साइटों का व्यापक रूप से संगत भागीदारों को खोजने के लिए उपयोग किया जा रहा है।

पहले अंतर्जातीय विवाह निषिद्ध थे। अब इसे कानूनी रूप से अनुमति प्रदान की गई है। युवा यह भी मानने लगे कि विवाह बाध्यात्मक नहीं है। कुछ पुरुष और महिलाएं प्राचीन धार्मिक मूल्यों में विश्वास नहीं करते हैं, और इसलिए विवाह को आवश्यक नहीं मानते हैं। सह-शिक्षा, महिला शिक्षा और समानता और स्वतंत्रता के लोकतांत्रिक आदर्श की वृद्धि, अंतर्जातीय वैवाहिक प्रात: के मजबूत कारक माने जाते हैं। पहले विवाह को एक पुरुष के लिए एक पूर्ण जीवन जीने का कर्तव्य माना जाता था। 1955 में तलाक के लिए प्रावधान किया गया। 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम ने कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में तलाक की अनुमति प्रदान कर हिंदू विवाह की संस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तुत किया है। इसके उपरांत भी हिंदुओं के बीच विवाह एक सामाजिक अनुबंध मात्र नहीं है, यह मान्यता सर्वमान्य है। यह अभी भी हिंदुओं के लिए एक संस्कार है। साथी के प्रति समर्पण को आज भी विवाह का सार माना जाता है।

सभी प्रयोगों के बाद अधिकतर युवा यही मानते हैं कि परिवार के समझदार सदस्य वैवाहिक व्यवस्था को भलीप्रकार समझते हैं वे उनके सुझावों का सम्मान करते हैं एवं कालांतर में परिवार के वरिष्ठ सदस्यों में भी एक बड़ा बदलाव आया है कि वे अब व्यर्थ ही अपने निर्णय बच्चों पर नहीं थोपते अपितु बच्चों की बातों का सम्मान करते हुए ही निर्णय लिये जा रहे हैं जो भारतीय वैवाहिक व्यवस्था में सुधारिकरण के लिए बड़ा कदम है। अच्छे संकेत है। 

पायल अक्सर अपनी सहेली जिया से चर्चा करती थी कि तुम बहुत खुशकिस्मत हो जो सब काम अपनी मर्जी से करती हो। मैं तो अपनी मर्जी से बाजार भी नहीं जा सकती। मेरे पापा तो पूरी दिनचर्या बनाकर बैठे रहते हैं कि इस समय यह कार्य करना है, इस समय यह। जिया कहने लगी, हाँ भई! इस मामले में तो मेरे पापा बहुत खुले विचारों के हैं। मैं कहां जाती हूँ, किसके साथ जाती हूँ, उन्हें इसके लिए कोई परेशानी नहीं है बल्कि मम्मी तो मुझे यदा-कदा बिन मांगे पैसे भी दे देती है। पायल को लगता है कि वह कैसे परिवार में फंस गई। सारा दिन या तो पढ़ाई करो और यदि कहीं जाना हैं तो पापा खुुद छोडऩे जायेंगे। एक दिन पायल को पता लगता है कि जिया किसी लड़के साथ लिव- इन-रिलेशनशिप में रहती थी, जो जिया का सबकुछ लुटपाट कर भाग गया। अब जिया डिप्रेशन में चली गई। उसे तुरंत ध्यान आया कि परिवार की जिन मर्यादाओं को वह बंदिश मान चली थी वास्तव में वहीं तो उसकी सुरक्षा चक्र है जिसके सहारे वह निर्भय, स्वछंद जीवन की उड़ान भर सकती है। तब से वह अपने मात-पिता का पहले से भी अधिक सम्मान करने लगी। उसके व्यवहार में एक जबरदस्त बदलाव देखने को मिला। भारतीय संस्कार उसे मर्यादाओं में रहते हुए आगे बढऩे की प्रेरणा दे रहे थे। 


गुरुवार, 29 अक्तूबर 2020

विदेशों में भी मचा रहे हरियाणवी संस्कृति की धूम

आस्ट्रेलिया में युवा पीढ़ी को हरियाणवी संस्कृति के साथ जोडऩे के लिए एएचए संस्था ने शुरु की विशेष मुहिम

आस्ट्रेलिया में भी पूरे परंपरागत तरीके के साथ मनाए जाते हैं हरियाणा के तीज-त्यौहार 

कोरोना के चलते इस बार ऑन लाइन मनाएंगे हरियाणा दिवस

नरेंद्र कुंडू 

आज जहां हमारी युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपनी संस्कृति से विमुख हो रही है वहीं आस्ट्रेलिया में बैठे हरियाणवी लोगों का अपनी संस्कृति के प्रति इतना गहरा प्रेम है कि वो वहां बसे हरियाणा के लोगों व आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोडऩे का काम कर रहे हैं। विदेश में बैठकर भी यह लोग हरियाणवी संस्कृति की छठा बिखेर रहे हैं। एसोसिएशन ऑफ हरियाणविज इन ऑस्ट्रेलिया (एएचए संस्था) के सदस्य विदेश में रहकर भी हरियाणा के सभी तीज-त्यौहारों को पूरे पारंपरिक तरीके व हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। कार्यक्रमों का आयोजन ऐसा होता है कि विदेशी लोग भी हरियाणवी संस्कृति से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते हैं। एएचए संस्था द्वारा हरियाणवी तीज-त्यौहार के अवसर पर आस्ट्रेलिया में आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में हरियाणी वेश-भूषा से लेकर हरियाणवी पकवानों जैसे गुलगुले, सिवाली, फिरनी, घेवर, खीर, चूरमा, पतासे इत्यादि बताए जाते हैं। महिलाएं घर से ही हरियाणवी पकवान तैयार कर साथ लेकर आती हैं। इतना ही नहीं ग्रुप के सभी सदस्य हर माह के आखिरी रविवार को एक साथ पिकनिक पर भी जाते हंै। पिकनिक के दौरान रागनी, चुटकले, गीत, लोक नृत्य इत्यादि हरियाणवी मनोरंजक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। विदेश में बैठकर हरियाणवी संस्कृति को बढ़ावा देने का इनका मुख्य उद्देश्य वहां पैदा होने वाले इनके बच्चों को हरियाणवी संस्कृति के साथ आत्मिक तौर पर जोडऩा, उनमें संस्कार पैदा करना तथा उन्हें पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से बचाए रखना है। ताकि वह बड़े होकर अपने समुदाय, संस्कृति व सभ्यता के साथ जुड़े रह सकें। लगभग 4 वर्ष पहले आस्ट्रेलिया के सिडनी से शुरु हुई यह संस्था अब आस्ट्रेलिया के मेल्बर्न, पर्थ, ऐडेलेड, ब्रिसबेन सहित कई राज्यों में स्थापित हो चुकी है। यह संस्था हरियाणा से यहां पढऩे के लिए आने वाले विद्यार्थियों व कामकाज के लिए आने वाले लोगों की मदद भी करती है। अपने तीज-त्यौहार पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में हरियाणा के लोगों को भी ऑन लाइन जोड़ा जाता है। संस्था की कार्यकारिणी टीम के अध्यक्ष सेवा सिंह, सदस्य मनजीत, विकास यादव, संगीता शर्मा, विजयपाल रेढू, वंदना पंजेटा, मोनिका, अमन, हनिश, दीपक का कहना है कि विदेश में पैदा होने वाली हमारी आने वाली पीढ़ी को अपने समुदाय, संस्कृति व सभ्यता के साथ आत्मिक तौर पर जोड़े रखने के लिए अपनी संस्कृति की जड़ों से जोडऩा बहुत जरुरी है। हमारी संस्कृति व सभ्यता एक पुष्प व सुगंध की तरह एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि चाहे तीज हो, रक्षाबंधन हो, दशहरा, दीवाली, होली-फाग कोई भी त्यौहार हो हर त्यौहार को पूरे परंपरागत तरीके से मनाया जाता है। फाग पर एक तालाब बुक किया जाता है पूरे परंपरागत तरीके से रंग-गुलाल के साथ फाग मनाया जाता है। महिलाएं पुरुषों को कोलड़े भी लगाती हैं। इसी प्रकार तीज पर झूले डाले जाते हैं व दीपावली पर घरों को सजाया जाता है। हरियाणा दिवस पर महिलाएं व पुरुष पूरी परंपरागत वेशभूषा में सजधज कर कार्यक्रम का आयोजन करते हैं। हर बार कार्यक्रमों का आयोजन अलग-अलग शहरों में किया जाता है और पूरे आस्ट्रेलिया में बसे हरियाणा के लोग इन कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। 



व्हाटसएप ग्रुप के माध्यम से बनाई जाती है कार्यक्रमों की रणनीति

संस्था के सदस्य मनजीत ने बताया कि संस्था द्वारा व्हाटसएप पर चार प्रकार के ग्रुप बनाए गए हैं। इसमें एक ग्रुप परिवारिक लोगों का, एक विद्यार्थियों का, एक ग्रुप महिलाओं का व एक ग्रुप जो लोग शादीशुदा नहीं हैं उनका है। इस प्रकार ये सभी लोग अपने सम्पर्क में आने वाले हरियाणा के लोगों को इन ग्रुप में शामिल कर लेते हैं। यदि किसी को किसी प्रकार की मदद की जरुरत है तो उसकी मदद भी करते हैं। वैसे तो महीने में एक बार प्रत्यक्ष तौर पर मिलना भी हो जाता है लेकिन व्हाटसएप ग्रुप में भी कार्यक्रम के आयोजन को लेकर पूरी रणनीति तैयार की जाती है। उदाहरण के तौर पर महिलाएं अपने ग्रुप में पकवानों में बारे में चर्चा करती हैं, वहीं दूसरे लोग कार्यक्रम के आयोजन की प्लानिंग करते हैं।  

रक्तदान शिविरों का भी करते हैं आयोजन

संस्था के सदस्यों ने बताया कि उनकी संस्था वहां के लोगों को मानवता का पाठ पढ़ाने के लिए हरियाणवी तीज-त्यौहार मनाने के अलावा सामाजिक कार्यों में भी भाग लेती है। वहां समय-समय पर रक्तदान शिविरों का आयोजन भी किया जाता है। वहां रक्तदान शिविर में सबसे ज्यादा रक्त एकत्रित करने का रिकार्ड भी उनकी संस्था के नाम है। 

कोरोना के कारण इस बार हरियाणा दिवस पर ऑन लाइन होगा कार्यक्रम का आयोजन 

एसोसिएशन ऑफ हरियाणविज इन ऑस्ट्रेलिया द्वारा वैसे तो हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हरियाणा दिवस प्रत्यक्ष तौर पर मनाया जाता था और रंगारंग हरियाणवी कार्यक्रम का आयोजन किया जाता था। संस्था द्वारा हरियाणा से भी कलाकारों को बुलाया जाता है लेकिन इस बार कोरोना काल के चलते हरियाणा दिवस पर प्रत्यक्ष तौर पर कार्यक्रम का आयोजन नहीं होने के कारण ऑन लाइन ही कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम में हरियाणाा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल, गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज विशेष तौर पर ऑन लाइन मौजूद रहेंगे। इसके अलावा हरियाणा की जानी-मानी हस्तियां महासिंह पूनिया, कीर्ति दहिया, चौधरी दरियाव सिंह मलिक, जनार्दन शर्मा, हरविंदर राणा, प्रीति चौधरी, महावीर गुड्डू व अन्य कलाकार इस कार्यक्रम में ऑस्ट्रेलिया की प्रतिभाओं के साथ ऑन लाइन ही मंच साझा करेें।  

शनिवार, 1 जून 2019

.......म्हारी छोरी के छोरयां तै कम हैं


इटली में आयोजित होने वाली वल्र्ड यूनिवर्सिटी चैम्पियनशिप में दौड़ेगी किसान की बेटी 
--छोटी सी उम्र में रेनू ने खेलों के क्षेत्र में लहराया परचम 
--गांव के सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा से शुरू किया एथलीट का सफर, अब वल्र्ड यूनिवर्सिटी चैम्पियनशिप में हुआ चयन
--परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बाद भी नहीं मानी हार, ओलम्पिक में मैडल जीतना है उद्देश्य
जींद, 1 जून (नरेंद्र कुंडू):- म्हारी छोरी के छोरयां तै कम हैं, दंगल फिल्म का यह डायलॉग जींद की चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय की बीपीएड की छात्रा रेनू पर स्टीक बैठता है। हिसार जिले के कोथ कलां गांव की 22 वर्षीय रेनू ने छोटी सी उम्र में एथलेटिक्स के क्षेत्र में अपना परचम लहराने का काम किया है। गांव के सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा से एथलीट का सफर शुरू करने वाली रेनू का चयन वल्र्ड यूनिवर्सिटी चैम्पियनशिप के लिए हुआ है। आगामी 3 से 14 जुलाई तक इटली में आयोजित होने वाली वल्र्ड यूनिवर्सिटी चैम्पियनशिप में रेनू हॉफ मैराथन (21 किलोमीटर) में भाग लेगी। एथलेटिक्स के क्षेत्र में अपने करियर की शुरूआत करने वाली रेनू थोड़े से समय में ही स्टेट से लेकर नैशनल स्तर पर कई पदक जीत चुकी है। रेनू के हौंसले इतने बुलंद हैं कि परिवार की कमजोर आर्थिक परिस्थितियां भी रेनू के रास्ते की बाधा नहीं बन पाई। गांव में जब रेनू के सपनों को आकार नहीं मिल पाया तो रेनू ने गांव छोड़ कर शहर में अपना डेरा जमा लिया। रेनू अब शहर में किराये पर रहकर पढ़ाई के साथ-साथ एथलेटिक्स की तैयारी कर रही है। रेनू का उद्देश्य ओलम्पिक में गोल्ड जीतना है। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रेनू खेल विभाग में एथलेटिक्स के कोच बीरबल दूहन से एथलेटिक्स के गुर सीख रही है।     

एथलीट रेनू का फोटो।
आर्थिक तंगी के बाद भी परिवार से मिला पूरा सहयोग 
रेनू संधू ने बताया कि परिवार में माता-पिता के अलाव वह तीन भाई-बहन हैं। उसकी एक बडी बहन है जो शादीशुदा है और उससे छोटा एक भाई है जो कॉलेज में पढ़ाई करता है। उसके पिता महावीर सिंह गांव में खेती-बाड़ी का कार्य करते हैं। इसके अलावा परिवार के पास आय का कोई दूसरा साधन नहीं है। परिवार का मुख्य व्यवसाय खेती-बाड़ी होने के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद भी परिवार के सदस्यों ने उसे लगातार आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया। 

गांव में नहीं मिल पाई प्रशिक्षण की सुविधा तो जींद का किया रूख 
रेनू ने बताया कि उसने गांव के सरकारी स्कूल में नौवीं कक्षा से एथलीट का सफर शुरू किया था। इस दौरान उसने जिला व राज्य स्तर पर कई पदक हासिल किए लेकिन गांव में प्रशिक्षण की सुविधा नहीं होने के कारण उसे बीच में ही खेल छोडऩा पड़ा। 12वीं कक्षा पास करने के बाद उसने अपने सपनों को साकार करने के लिए शहर का रूख किया और जींद कॉलेज में बीएससी में दाखिला लिया। बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद जींद के चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय में बीपीएड में दाखिला लिया। शहर में आने के बाद उसने दोबारा से अभ्यास शुरू किया। शहर के अर्जुन स्टेडियम में उसने दोनों समय अभ्यास के लिए जाना शुरू कर दिया। खेल विभाग के एथलेटिक्स के कोच बीरबल दूहन की देखरेख में उसने अपनी तैयारी शुरू की और फिर से एथलेटिक्स के ग्राउंड पर अपनी पहचान बनाई। 

प्रतियोगिता में दौड़ लगाती रेनू का फाइल फोटो।
यह हैं रेनू की उपलब्धियां
रेनू ने गांव के सरकारी स्कूल में 9वीं से एथलेटिक्स की तैयारी शुरू की। 10वीं कक्षा में पहली बार में ही 1500 मीटर व तीन किलोमीटर की दौड़ में स्टेट लेवल पर गोल्ड मैडल हासिल किया। इसके बाद 11वीं व 12वीं कक्षा में पढ़ाई के साथ-साथ नार्थ जॉन में तीन किलोमीटर दौड़ में सिल्वर मैडल हासिल किया। जनवरी 2015 में झांसी में आयोजित अंडर 18 आयु वर्ग जूनियर नेशनल क्रॉस कंट्री में ब्रॉन्ज मैडल हासिल किया। इसके बाद गोवा में आयोजित यूथ नेशनल चैम्पियनशिप में तीन किलोमीटर दौड़ में ब्रॉन्ज मैडल हासिल किया। नवंबर 2018 में मंगलूरू में आयोजित ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैम्पियनशिप में 21 किलोमीटर हॉफ मैराथन में सिल्वर मैडल हासिल किया। 2019 में जींद में आयोजित मैराथन में रेनू ने दूसरा स्थान प्राप्त किया। इसके बाद रेनू ने भुवनेश्वर में वल्र्ड यूनिवर्सिटी ट्रायल में भाग लिया और रेनू का चयन वल्र्ड यूनिवर्सिटी चैम्पियनशिप के लिए हुआ। रेनू अब तीन से 14 जुलाई तक इटली में आयोजित होने वाली वल्र्ड यूनिवर्सिटी चैम्पियनशिप में 21 किलोमीटर हॉफ मैराथन में भाग लेगी।






अपने कोच बीरबल दूहन के साथ रेनू।


जींद में आयोजित मैराथन में दूसरा स्थान हासिल करने पर रेनू को सम्मानित करते मुख्यमंत्री मनोहर लाल। 



प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल करने पर विक्टरी स्टैंड पर मौजूद खिलाड़ी रेनू का फाइल फोटो।  

शनिवार, 11 मई 2019

12 मई को इन मामा-फूफा वालों का एक बटन से बांध देना इलाज : दुष्यंत

कहा, भाजपा ने जात-पात व धर्म के नाम पर देश को बांटने का काम किया
जजपा की सरकार बनने पर जींद को बनाएंगे राजधानी, गोहाना को बनाएंगे जिला

जींद, 10 मई (नरेंद्र कुंडू):- हिसार के सांसद दुष्यंत चौटाला ने कहा कि हरियाणा में कांग्रेस का आधार जिस तरह से गिरा है और भाजपा को जिस तरह से विरोध का सामना करना पड़ रहा है उससे यह साफ हो गया है कि इस लोकसभा चुनाव में हरियाणा में सबसे ज्यादा सीटें जजपा-आप गठबंधन जीतेगा। मोदी केवल अखबारों व टीवी तक सिमट कर रह गया है। जनता में मोदी का कोई प्रभाव नहीं है। भाजपा ने देश को जात-पात व धर्म के नाम पर बांटने का काम किया है। गुजरात में हिंदू को मुस्लमान से, उत्तरप्रदेश में यादव को दूसरी जात के लोगों व हरियाणा में जाट को नॉन जाट से लड़ाने का काम किया है। वहीं कांग्रेस ने अपने शासनकाल में देश में भ्रष्टाचार फैलाने का काम किया था। इसलिए इस चुनाव में जनता इन दोनों पार्टियों को सबक सिखाने का काम करेगी। दुष्यंत चौटाला शुक्रवार को जींद के हुडा ग्राउंड में जजपा व आप गठबंधन के सोनीपत के प्रत्याशी दिग्विजय चौटाला के पक्ष में प्रचार अभियान के दौरान जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे।  
दुष्यंत चौटाला ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह पर निशाना साधते हुए कहा कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा हिसार में अंदर खाते चुनाव जीताने के लिए बीरेंद्र सिंह के बेटे बृजेंद्र सिंह की मदद कर रहे हैं और बीरेंद्र सिंह रोहतक में दीपेंद्र की मदद कर रहे हैं। इस प्रकार यह दोनों पर्दे के पीछे से अपनी रिश्तेदारी निभा रहे हैं। दुष्यंत ने कहा कि ये दोनों मामा-फूफा वाले म्हारे पाछै पड़ गए हैं। अबकी बार 12 मई को एक बटन से इन मामा-फूफा वालों का इलाज कर देना है। दुष्यंत ने कहा कि आज कुछ लोग उन पर आरोप लगा रहे हैं कि वह भाजपा की बी टीम हैं लेकिन सही मायने में देखा जाए तो भूपेंद्र हुड्डा भाजपा की बी टीम के तौर पर काम कर रहे हैं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने राज्य सभा चुनाव में स्याही बदल कर भाजपा की मदद की थी। पिछले पांच साल में भूपेंद्र सिंह हुड्डा सीबीआई के डर से एक बार भी प्रधानमंत्री के खिलाफ नहीं बोला। जींद उपचुनाव में भी हुड्डा ने भाजपा नेताओं के साथ मिलकर अपनी ही पार्टी के नेता सुरजेवाला के खिलाफ षडयंत्र रचकर भाजपा की मदद की थी। दुष्यंत ने कहा कि भाजपा के साढ़े चार साल के शासन काल में हरियाणा में चार बार मिल्ट्री बुलानी पड़ी थी। भाजपा ने अपने शासन काल में प्रदेश में जात-पात का जहर फैलाने का काम किया। लोगों को गुमराह करने के लिए मुरथल को बदनाम करने का काम किया। अगर भाजपा के शासन काल की बात की जाए तो सबसे ज्यादा शहीद तो भाजपा के शासन काल में हुए हैं। भाजपा ने दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का काम किया था लेकिन भाजपा के शासन काल में 50 लाख युवा बेरोजगार हो गए। भाजपा ने किसानों की आय दोगुणा करने का वायदा किया था लेकिन भाजपा के शासन काल में किसानों का कर्ज दोगुणा हो गया। दुष्यंत ने कहा कि बीरेंद्र सिंह ने 47 साल जींद के नाम पर राजनीति की और लोगों से बार-बार उसे सीएम बनाने का राग अलापते रहे लेकिन वह मुख्यमंत्री नहीं बन पाए और अब तो वह राजनीति से सन्यास ले चुके हैं। इसलिए अबकी बार लोगों के पास मौका है कि जजपा की सरकार चुनने का काम करें। जजपा की सरकार आने के बाद जींद को राजधानी व गोहाना को जिला बनाने का काम किया जाएगा। डबवाली की विधायक नैना चौटाला ने महिलाओं से आह्वान करते हुए कहा कि 12 मई को चप्पल पहन कर झाडू से सभी विरोधियों का सफाया कर चप्पल के निशान का बटन दबाना है। राज्य सभा सांसद सुशील गुप्ता ने कहा कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की तर्ज पर हरियाणा में बदलाव लाने के लिए जजपा के साथ गठबंधन किया है। भाजपा ने व्यापारियों के व्यापार को खत्म किया तो कांग्रेस ने देश में भ्रष्टाचार फैलाने का काम किया। अब जजपा व आप मिलकर हरियाणा में शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार कर भ्रष्टाचार को खत्म करने का काम करेंगे। 

हुड्डा कहवै है दिग्विजय तो म्हारी कढ़ी बिगाडऩ आया है।

दुष्यंत चौटाला ने सोनीपत से कांग्रेस प्रत्याशी भूपेंद्र ङ्क्षसह हुड्डा पर तंज कसते हुए कहा कि दिग्विजय के चुनाव मैदान में आने के बाद हुड्डा की नींद उड़ गई है। हुड्डा कहवै है के दिग्विजय तो म्हारी कढ़ी बिगाडऩ आया है। मैं कहूं हूं के कढ़ी तो म्हारे बागडिय़ां में बन्या करै, देशवालिया में कढ़ी कद तै बनन लाग गई। जै हुड्डा ने कढ़ी खानी थी तो कढ़ी तो रोहतक वाले भी खिला देते याड़े ससुराल में कढ़ी खान क्यों आया। 

6 माह पहले बनी पार्टी ने पीएम के छुड़ाए पसीने

दुष्यंत चौटाला ने कहा कि 6 माह पहले जींद के इसी मैदान में जन्मी पार्टी ने सभी विरोधी दलों की नींद हराम कर दी है। आज हर विपक्षी दल की नजरें जजपा पर है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोहतक की रैली में जजपा पार्टी पर अपनी टिप्पणी की। प्रधानमंत्री की जजपा पर टिप्पणी यह दर्शाती है कि जजपा दिन-प्रतिदिन मजबूत हो रही है। जजपा ने प्रधानमंत्री तक के पसीने छुड़ा दिए हैं। 

हुड्डा ऐसा बादल जो पानी जींद-सोनीपत से लेता है लेकिन बरसता किलोई में जाकर है। 

दिग्विजय चौटाला ने कहा कि उनके परदादा चौधरी देवीलाल ने जींद के इस ग्राउंड से न्याय युद्ध की शुरूआत की थी और उन्हें सोनीपत से ही पहला चुनाव लड़ा था। यह उनका सौभग्य है कि उन्हें भी सोनीपत से चुनाव लडऩे का मौका मिला है। हुड्डा उन पर आरोप लगा रहा है कि उन्होंने भाजपा से करोड़ों रुपए लेकर सोनीपत से चुनाव लड़ा है जबकि सच्चाई यह है कि हुड्डा भाजपा के साथ सांठगांठ किए हुए है। जींद उपचुनाव में हुड्डा ने सुरजेवाला को नहीं बल्कि भाजपा को वोट डलवाए थे। हुड्डा बदला लेने की बात करता है जबकि हम बदलाव की बात करते हैं। दिग्विजय ने कहा कि हुड्डा तो ऐसा बादल है जब पानी लेने की बात आती है तो पानी जींद व सोनीपत से लेता है और जब बरसने की बात आती है तो किलोई में जाकर बरसता है। दिग्विजय ने कहा कि जजपा के सत्ता में आने के बाद हैबतपुर के पास विधानसभा होगी, पिंडारा के पास सचिवालय होगा और जींद रोड पर मुख्यमंत्री की कोठी बनेगी। दिग्विजय ने कहा कि एमपी दो तरह के होते हैं एक तालियां पीटने वाले और एक काम करने वाले। जब मैं एमपी बनुंगा तो तालियां नहीं पिटूंगा बल्कि संसद में जींद-जींद चिलाउंगा। 
जनसभा को सम्बोधित करते दिग्विजय चौटाला। 

जब जाटों को हुड्डा की जरूरत थी तो हुड्डा ने जाटों को दिखाई पीठ

दिग्विजय चौटाला ने कहा कि आज चुनाव में हुड्डा को जाटों की याद आई है जब जाटों को हुड्डा की जरूरत थी तो हुड्डा ने जाटों की मदद करने की बजाए जाटों को हमेशा पीठ दिखाने का काम किया। रोहतक में जब चौधरी छोटू राम के नाम से शिक्षण संस्थान बन रहा था तो हुड्डा ने उस शिक्षण संस्थान में भी कोई मदद नहीं की। 
फोटो कैप्शन





गुरुवार, 9 मई 2019

मोदी ने अपने शासनकाल में ऐसा काम किया देश खुश और विरोधी परेशान : हेमा मालिनी

--कांग्रेस के शासनकाल में देश के हालात हो गए थे खराब, मोदी ने देश को दी नई दिशा
--कांग्रेस ने आतंकवाद के खिलाफ नहीं की कार्रवाई, मोदी ने 13 दिन में लिया पुलवामा का बदला

जींद, 9 मई (नरेंद्र कुंडू):- मथुरा की सांसद एवं मशहूर वालीवुड अभिनेत्री हेमा मालिनी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पांच साल के कार्यकाल में देश हित में ऐसे काम किए हैं जिनसे देश की जनता खुश है और विरोधी परेशान। आज कोई भी विरोधी देश भारत की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। देश में विकास का रथ चल रहा है। आज देश में मोदी लहर चल रही है। नरेंद्र मोदी के कार्यों को देखते हुए एक बार फिर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाना जरूरी है। हेमा मालिनी वीरवार को शहर के टाउन हाल पर सोनीपत लोकसभा से भाजपा प्रत्याशी रमेश कौशिक के पक्ष में प्रचार अभियान के दौरान जनसभा को सम्बोधित कर रही थी। हेमा मालिनी ने बृजवासी अंदाज में राधे-राधे बोलकर अपने भाषण की शुरूआत की। 
हेमा मालिनी ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में देश के हालात बिल्कुल खराब हो गए थे। देश में आतंकवाद, भ्रष्टाचार चर्म पर था। देश की आर्थिक व्यवस्था बुरी तरह से खराब हो चुकी थी लेकिन 2014 में देश में आई मोदी लहर ने देश को कांग्रेस के कुशासन से मुक्ति दिलाकर देश को नई दिशा देने का काम किया। कांग्रेस के शासनकाल में आतंकवाद ने देश में अपनी जड़े जमा ली थी। कांग्रेस के शासनकाल में मुंबई में इतना बड़ा हमला हुआ लेकिन कांग्रेस ने आतंकवाद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 दिन में ही सर्जिकल स्ट्राइक कर पुलवामा हमले का बदला ले लिया। हम भाजपा के साथ जुड़कर गर्व महसूस करते हैं। यह हमारा सौभग्य है कि हमें दिन-रात काम करने वाला प्रधानमंत्री मिला है। आज देश से आतंकवाद खत्म हो चुका है और देश विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। इसलिए हमारा फर्ज बनता है कि हम सोनीपत लोकसभा क्षेत्र से सांसद रमेश कौशिक को भारी मतों से विजयी बनाकर नरेंंद्र मोदी के हाथ मजबूत करें। उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा कि विरोधी दलों के लोग उनके पास आएंगे और उन्हें बहलाने का प्रयास करें लेकिन वह उनकी बातों में नहीं आएं। तिरंगे के मान के लिए कमल के फूल के सामने का बटन दबाकर देश में फिर से भाजपा की सरकार लाएं। 

चल धन्नो आज तेरी बसंती की इज्जत का सवाल है। 

हेमा मालिनी ने अपने भाषण के अंत में शोले फिल्म का डॉयलॉग बोलते हुए कहा 'चल धन्नो आज तेरी बसंती की इज्जत का सवाल है और सोनीपत से रमेश कौशिक को जीता देना नहीं तो बसंती नाराज हो जाएगी।Ó हेमा ने मथुरा में अपनी जनसभा का जिक्र करते हुए कहा कि जब धर्मेंद्र मथुरा में उनके पक्ष में जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे तो उन्होंने वहां के लोगों से फिल्मी अंदाज में यही कहा था कि मथुरा से बसंती को जीता देना नहीं तो वीरु नाराज होकर टंकी पर चढ़ जाएगा। 

मोदी बन गया है ट्रेड मार्क

सांसद हेमा मालिनी ने कहा कि आज जब भी वह किसी भी जनसभा को सम्बोधित करने के लिए जाती हैं तो उन्हें भाषण देने की जरूरत नहीं पड़ती। वह माइक से बस मोदी-मोदी बोल देती हैं तो चारों तरफ मोदी-मोदी के नारे गुंजने लगते हैं। आज मोदी एक ट्रेड मार्क बन गया है। मोदी के नारे लगाने वाले लोगों के चेहरे पर एक अलग खुशी नजर आती है। 

हेमा के सभा स्थल पर पहुंचते ही फैली अव्यवस्था, 10 मिनट में निपटाया भाषण

सांसद हेमा मालिनी दोपहर 1:20 मिनट पर हेलीपैड से गाड़ी में सवार होकर सभा स्थल पर पहुंची। हेमा के यहां पहुंचते ही उनकी झलक पाने के लिए लोग मंच की तरफ उमड़ पड़े। इससे सभा स्थल पर काफी अव्यवस्था हो गई। पुलिस प्रशासन को व सुरक्षा व्यवस्था में लगे लेगों को व्यवस्था बनाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। सभा स्थल पर पहुंचने के बाद हेमा मालिनी महज 15 मिनट ही सभा स्थल पर रुकी। हेमा 10 मिनट में अपना भाषण निपटाकर वहां से वापिस रवाना हो गई। 

आज मेरी पहचान फिल्म अभिनेत्री नहीं भाजपा नेत्री के तौर पर है। 

सांसद हेमा मालिनी ने कहा कि उन्हें भाजपा के साथ अपने आप पर गर्व हो रहा है। उन्होंने काफी लंबे समय तक फिल्मों में काम किया इसलिए लोग उन्हें फिल्म अभिनेत्री के तौर पर जानते थे लेकिन अब उनकी पहचान फिल्म अभिनेत्री नहीं भाजपा नेत्री के तौर पर है। 

सेल्फी लेने वाले युवकों को हड़काया

भाजपा प्रत्याशी रमेश कौशिक के पक्ष में प्रचार के लिए आई वालीवुड अभिनेत्री हेमा मालिनी की नाक पर गुस्सा साफ नजर आ रहा था। हेमा मालिनी जैसे ही हैलीकॉप्टर से नीचे उतरकर सभा स्थल की तरफ रवाना होने के लिए आई तो रास्ते में कुछ युवक उनके साथ सेल्फी लेने पहुंच गए। सेल्फी लेने वाले युवकों को हेमा मालिनी ने बुरी तरह से डांटा। इसके बाद जब हेमा मालिनी टाउन हाल पर जनसभा को सम्बोधित करने के लिए मंच पर पहुंची तो एक युवक यहां भी उनके साथ सेल्फी लेने लगा। हेमा ने यहां भी उस युवक को बुरी तरह से फटकार लगाई। इतना ही नहीं जब हेमा भाषण देने के लिए उठी तो हेमा ने माइक के पास खड़े सभी लोगों को वहां से हटने का इशारा किया।  





मंच से लोगों का अभिवादन स्वीकार करती सांसद हेमा मालिनी।

जनसभा को सम्बोधित करती हेमा मालिनी। 

बांगर व खादर के राजनीतिक समीकरणों की मझधार में फंसी उम्मीदवारों की नैया

सोनीपत लोकसभा हॉट सीट : 
--सोनीपत लोस सीट पर हर उम्मीदवार की अपनी चुनौती
--कांग्रेस व भाजपा में बना मुकाबला, अन्य उम्मीदवार जमानत बचाने के लिए कर रहे संघर्ष
--रमेश कौशिक मोदी के नाम पर, हुड्डा क्षेत्र की चौधर के नाम तो दिग्विजय जींद को राजधानी बनाने के नाम पर मांग रहे वोट 

जींद, 8 मई (नरेंद्र कुंडू):- पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के चुनावी रणक्षेत्र में आने के बाद सोनीपत लोकसभा सीट हॉट सीट बन गई है और पूरे हरियाणा की नजर सोनीपत लोस सीट पर टिकी हुई है। लेकिन सोनीपत लोकसभा क्षेत्र बांगर व खादर दो क्षेत्रों में बंटा हुआ है। इसमें 6 विधानसभा क्षेत्र खादर (सोनीपत) व 3 विधानसभा क्षेत्र बांगर (जींद) के शामिल हैं। इसके चलते यहां बांगर व खादर क्षेत्र में बन रहे राजनीतिक समीकरणों की मझधार में उम्मीदवारों की नैया फंसी हुई है। यदि पिछले लोकसभा चुनाव परिणाम पर नजर डाली जाए तो मोदी लहर में सांसद रमेश कौशिक को जीत हासिल करवाने में सोनीपत लोकसभा क्षेत्र के 9 विधानसभा क्षेत्रों में से खादर के तीन व बांगर के दो विधानसभा क्षेत्रों का अहम योगदान था लेकिन इस बार बांगर की धरती पर हो रहे सांसद रमेश कौशिक के विरोध ने सांसद की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वहीं जजपा व आप गठबंधन से दिग्विजय चौटाला के चुनाव मैदान में आने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। इस समय यदि चुनावी समीकरणों पर नजर डाली जाए तो मुकाबला भाजपा व कांग्रेस के बीच नजर आ रहा है। अन्य उम्मीदवारों इस समय केवल अपनी जमानत बचाने के लिए जद्दोजहद करते नजर आ रहे हैं। जींद जिले में हो रहे भारी विरोध के बावजूद सांसद रमेश कौशिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर तो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र ङ्क्षसह हुड्डा क्षेत्र की चौधर के नाम पर वोट मांगते नजर आ रहे हैं। वहीं जजपा प्रत्याशी दिग्विजय चौटाला जींद को राजधानी बनाने के मुद्दे को भुनाने के प्रयास में हैं। सोनीपत लोकसभा के बांगर व खादर दो अलग-अलग क्षेत्रों में बंटा होने के कारण यहां हर उम्मीदवार के लिए अपनी-अपनी चुनौतियां हैं। 

कांग्रेस के लिए अपना वोट बैंक बचाना भी एक चुनौती

कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग रहा है लेकिन भाजपा के सत्ता में आने के बाद भाजपा कांग्रेस के इस वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल रही है। जींद उपचुनाव में इसका परिणाम देखने को मिला है। शहरी पार्टी माने जाने वाली भाजपा ने जींद उपचुनाव में ग्रामीण क्षेत्र से भी अच्छी वोट हासिल की थी। इस प्रकार यदि देखा जाए तो भाजपा कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी करने में सफल रही है। इससे कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ी हैं। 

कांग्रेस की गुटबाजी हुड्डा के लिए खड़ी कर सकती है परेशानी

कांग्रेस की अंदरुनी कलह ही कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल है। हाल ही में हुए जींद उपचुनाव में कांग्रेस की गुटबाजी के परिणाम सामने आए थे, जिसके चलते कांग्रेस के दिग्गिज नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला बड़ी मुश्किल से अपनी जमानत बचा पाए थे। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर व पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की आपसी गुटबाजी किसी से छुपी नहीं है। कांग्रेस की अंदरुनी गुटबाजी पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है।

हुड्डा ने देवीलाल को तीन बार किया पराजित, अब चौथी पीढ़ी हुड्डा को दे रही चुनौती  

हरियाणा ही नहीं देश की राजनीति में चौधरी देवीलाल का बड़ा कद रहा है। लेकिन यदि लोकसभा चुनाव के भूतकाल में देखा जाए तो चुनाव मैदान में चौधरी देवीलाल को तीन बार भूपेंद्र ङ्क्षसह हुड्डा के सामने हार का मुंह देखना पड़ा था। रोहतक लोकसभा सीट पर 1991, 1996 व 1998 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने तीन बार चौधरी देवीलाल को पराजित किया था। अब सोनीपत लोकसभा क्षेत्र से चौधरी देवीलाल की चौथी पीढ़ी दिग्विजय चौटाला का भूपेंद्र सिंह हुड्डा से आमना-सामना है। दिग्विजय चौटाला के चुनाव मैदान में आने से हुड्डा को नुकसान हो सकता है।



कई प्रत्याशी जमानत बचाने के लिए कर रहे जद्दोजहद

सोनीपत लोकसभा सीट पर इस समय मुकाबला कांग्रेस व भाजपा के बीच नजर आ रहा है। जींद उपचुनाव में 37 हजार वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रहने वाले जजपा प्रत्याशी दिग्विजय चौटाला के लिए इस बार राह आसान नहीं है। दिग्विजय चौटाला जींद को राजधानी बनाने के नाम पर वोट मांग रहे हैं लेकिन सोनीपत लोकसभा क्षेत्र में जींद जिले के केवल तीन व सोनीपत जिले के 6 विधानसभा क्षेत्र हैं। सोनीपत जिले पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा का प्रभाव ज्यादा है। इसके चलते जजपा प्रत्याशी दिग्विजय चौटाला की राह आसान नहीं है। इनैलो, लोसपा सहित अन्य उम्मीदवार इस समय जीत के लिए नहीं बल्कि जमानत बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।  

शहीद की मां ने सांसद रमेश कौशिक से सवाल पूछे तो चढ़ा सांसद का पारा

लोकसभा सोनीपत से बीजेपी प्रत्याशी रमेश कोशिश सोमवार देर सायं गांव मुआना में प्रचार अभियान के लिए पहुंचे तो इस दौरान शहीद राजेंद्र राणा की मां ने चौपाल में ही सांसद रमेश कौशिक से सवाल पूछने शुरू कर दिए। शहीद राजेंद्र राणा की मां ने सांसद रमेश कौशिक से कहा कि जब मेरा लड़का शहीद हुआ तो आप पांच लाख रुपए देने की घोषणा करके गए थे लेकिन आज तक वह राशि हमारे परिवार को नहीं मिली है। शहीद की मां के सवाल पूछे जाने के बाद सांसद रमेश कौशिक शहीद की मां पर भड़क गए। इससे नाराज होकर ग्रामीणों ने सांसद रमेश कौशिक के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। ग्रामीणों के विरोध को देखते हुए सांसद रमेश कौशिक बीच में ही कार्यक्रम छोड़कर चले गए। इसके अलावा भी कई गांवों में सांसद रमेश कौशिक का विरोध हो चुका है।  

सोनीपत सीट पर 11 चुनावों में से तीन बार कांग्रेस व तीन बार भाजपा का रहा है कब्जा 

हरियाणा गठन के बाद 1977 में सोनीपत लोकसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया था। सोनीपत लोकसभा सीट पर अब तक 11 बार चुनाव हो चुके हैं। इन 11 चुनाव में से सोनीपत सीट पर तीन बार कांग्रेस तो तीन बार भाजपा पार्टी का कब्जा रहा है। जबकि एक-एक बार जनता पार्टी व जनता पार्टी (एस), जनता दल, हरियाणा लोकदल व आजाद उम्मीदवार विजयी होकर लोकसभा पहुंचे हैं। 1984 में कांग्रेस उम्मीदवार धर्मपाल मलिक के सबसे कम 2941 वोटों के अंतराल से जीत हासिल करने तथा 1977 के चुनावों में जनता पार्टी उम्मीदवार मुखत्यार सिंह 280223 वोटों के अंतराल से जीत हासिल करने का रिकार्ड दर्ज है। 
 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

डेरा व रामपाल अनुयायियों की नाराजगी भाजपा पर पड़ सकती है भारी