Tuesday, 29 May 2018

जल संस्कृति को बचाना होगा

नरेंद्र कुंडू 
एक तरफ हम जल को देवता मानकर उसकी पूजा करते हैं, तो दूसरी तरफ इस देवता का निरादर करने में किसी भी तरह पीछे नहीं रहते हैं। कारण व्यत्तिफ़ हो या बाजार, हर कोई अपनी-अपनी तरह से इस दोहन में शामिल है। आज जरूरत है कि हम जल के प्रति अपने संस्कार और संस्कृति को पुनर्जीवित करें। पानी के बिना मनुष्य जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जन्म से लेकर मृत्यु तक पानी का हमारे जीवन में बहुत बड़ा स्थान है बल्कि कह सकते हैं कि पानी ही उसकी धुरी है। हमारे शास्त्रें में कहा गया है कि जल में ही सारे देवता रहते हैं। इसीलिये जब कोई धार्मिक अनुष्ठान होता है तो सबसे पहले कलश यात्र निकलती है। हम किसी पवित्र सरोवर या जलाशय में जाते हैं और वहां से अपने कलश में जल भरकर ले आते हैं। चूंकि जल में हमारे सभी देवता बसते हैं इसलिये हम उसकी पूजा करते हैं और फिर उसी जलाशय में उसका विसर्जन कर देते हैं। इस तरह व्यष्टि को समष्टि में मिला देते हैं। ‘अमरकोश’ में जल के कई नाम गिनाये गये हैं। उसमें जल के लिये एक नाम जीवन भी है। जीवन जलम। अब सवाल यह है कि जल जो हमारी संस्कृति में इतना अहम स्थान रऽता रहा है, उसकी इतनी दुर्दशा क्यों हो रही है? कारण दैवीय और आसुरी शत्तिफ़यों के संघर्ष में छिपा है। यह संघर्ष सनातन है। कभी एक पक्ष की शत्तिफ़ बढ़ती है, कभी दूसरे की। जो जल संरक्षण के लोग हैं वे दैवीय शत्तिफ़ के लोग हैं। दूसरी तरफ आसुरी शत्तिफ़यां हैं जो जल को नष्ट करने का स्वाभाविक रूप से प्रयास करती रहती हैं। जब हम पूजा में बैठते हैं तो सबसे पहले कलश में जल की उपासना करते हैं कि वे कलश में आ कर विराजमान हों। इस समय हम एक मंत्र पढ़ते हैं जिसमें सभी नदियों, जलाशय और समुद्र का आ“वान करते हैं कि वे इस कलश में विराजें और देवी पूजा में सहायक हों। जब हम ऐसा करते हैं तो हमें इस बात का भी एहसास होता है कि देवी पूजा के लिये जिस जल का हम आ“वान कर रहे हैं उसे प्रदूषणमुत्तफ़ बनाना भी हमारा कर्त्तव्य है। अन्यथा प्रदूषित पानी कलश में आएगा और हमें उसी से देवी-देवताओं की पूजा करनी पड़ेगी। हम मानते हैं कि जल में दो प्रकार की शत्तिफ़ है। एक तो वह भौतिक मैल को धोता है। दूसरा उसमें आधि भौतिक मैल धोने की भी शत्तिफ़ है। यदि जल संरक्षण के उपाय शीघ्र न किये गये तो जल संस्कृति का भविष्य खतरे में घिरता नजर आ रहा है। 

Saturday, 28 April 2018

दोहरी नीति का शिकार हो रही हिन्दी

नरेन्द्र कुंडू 
जब से मानव अस्तित्व में आया तब से ही भाषा का उपयोग कर रहा है चाहे वह ध्वनि के रूप में हो या सांकेतिक रूप में। भाषा हमारे लिए बोलचाल व संप्रेषण का माध्यम होती है। भाषा राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। देश में प्रचलित विविध भाषाएं व बोलियां हमारी संस्कृति, उदात्त परंपराओं, उत्कृष्ट ज्ञान एवं विपुल साहित्य को अक्षुष्ण बनाये रखने के साथ ही वैचारिक नवसृजन हेतु भी परम आवश्यक है। विविध भाषाओं में उपलब्ध साहित्य की अपेक्षा कई गुना अधिक ज्ञान गीतों, लोकोत्तिफ़यों तथा लोक कथाओं की मौखिक परंपरा के रूप में होता है। यदि राष्ट्र को सशक्त बनाना है तो एक भाषा होनी चाहिए। प्रत्येक विकसित तथा स्वाभिमानी देश की अपनी एक भाषा अवश्य होती है। किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उसे ही बनाया जाता है जो उस देश में व्यापक रूप में फैली होती है। हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी भारत के ज्यादातर राज्यों में प्रमुख रूप से बोली जाती है। हिन्दी भाषा के विकास में संतों, महात्माओं तथा उपदेशकों का योगदान भी कम नहीं आंका जा सकता। क्योंकि वह आम जनता के अत्यंत निकट होते हैं। इनका जनता पर बहुत बड़ा प्रभाव होता है। हमारा फिल्म उद्योग तथा संगीत हिन्दी भाषा के आधार पर ही टिका हुआ है। 4 सितम्बर 1949 को संविधान की भाषा समिति ने हिंदी को राजभाषा के पद पर आसीन किया क्योंकि भारत की बहुसंख्यक जनता द्वारा हिन्दी भाषा का प्रयोग किया जा रहा था। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिन्दी भाषा में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं ने देश को आजाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाई तथा भारतीयों को एक सूत्र में बांधे रखा। स्वतंत्रता के पश्चात् भले ही हिन्दी को राष्ट्रभाषा व राजभाषा का दर्जा दिया गया लेकिन भाषा के प्रचार व प्रसार के लिए सरकार द्वारा सराहनीय कदम नहीं उठाए गए। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग अनवरत चलता रहा। भले ही आज विश्व के सभी महत्वपूर्ण देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है। परन्तु विडंबना यह है कि विश्व में अपनी अच्छी स्थिति के बावजूद हिन्दी भाषा अपने ही घर में उपेक्षित जिंदगी जी रही है। आज विविध भारतीय भाषाओं व बोलियों के चलन तथा उपयोग में आ रही कमी, उनके शब्दों का विलोपन व विदेशी भाषाओं के शब्दों से प्रतिस्थापन एक गम्भीर चुनौती बन कर उभर रहा है। अपने देश में अंग्रेजी बोलने वालों को तेज-तर्रा, बुद्धिमान व हिन्दी बोलने वालों को अनपढ़, गवार जताने की परम्परा रही है। राजनेताओं द्वारा हिन्दी को लेकर राजनीति की जा रही है। जब भी हिन्दी दिवस आता है, हिन्दी को लेकर लम्बे-लम्बे वक्तव्य देकर हिन्दी पखवाड़े का आयोजन कर इतिश्री कर ली जाती है। हिन्दी हमारी दोहरी नीति का शिकार हो चुकी है। यही कारण है कि हिन्दी आज तक व्यावहारिक दृष्टि से राष्ट्र भाषा नहीं बन पाई है। देश की विविध भाषाओं तथा बोलियों के संरक्षण और संवर्द्धन के लिये सरकारों, नीति निर्धारकों, स्वैच्छिक संगठनों व समस्त समाज को सभी संभव प्रयास करने चाहियें।

Sunday, 4 March 2018

‘विद्यार्थियों में बढ़ता तनाव’

नरेंद्र कुंडू 
प्रसिद्ध चिंतक अरस्तू ने कहा था कि आप मुझे 100 अच्छी माताएं दें तो मैं तुम्हें अच्छा राष्ट्र दूंगा। मां के हाथों में राष्ट्र निर्माण की कुंजी होती है किंतु आज ऐसी माताओं व सोच की कमी महसूस हो रही है। जीवन स्तर बढ़ने के साथ-साथ भौतिक प्रतिस्पर्धा भी अपने चरम पर है, जिसका दुष्प्रभाव तनाव युत्तफ़ जीवनशैली से आत्महत्या का बढ़ता चलन देखने में आ रहा है। बड़े दुःख  विषय है आज विद्यार्थियों में लगन व मेहनत से विद्या ग्रहण करने की प्रवृत्ति लुप्त होती जा रही है। वे जीवन के हर क्षेत्र में शॉर्टकट मार्ग अपनाना चाहते हैं और असफल रहने पर गलत कदम उठा लेते हैं। आजकल अभिभावक भी बच्चों पर पढ़ाई और करियर का अनावश्यक दबाव बनाते हैं। वे ये समझना ही नहीं चाहते की प्रत्येक बच्चे की बौद्धिक क्षमता भिन्न होती है जिसके चलते हर विद्यार्थी कक्षा में प्रथम नहीं आ सकता। बाल्यकाल से ही बच्चों को यह शिक्षा दी जानी चाहिए कि असफलता ही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। बच्चों में आत्मविश्वास की कमी भी एक बहुत बड़ा कारक है। आज खुशहाली के मायने बदल रहे हैं अभिभावक अपने बच्चाें को हर क्षेत्र में अव्वल देऽने व सामाजिक दिखवे के चलते उन्हें मार्ग से भटका रहे हैं। वास्तविकता यह है कि गरीब बच्चे फिर भी संघर्षपूर्ण जीवन में मेहनत व हौंसले के बलबूते अपनी मंजिल पा ही लेते हैं। किन्तु अक्सर धन-वैभव से भरे घरों में अधिक तनाव का माहौल होता है और एक-दूसरे से अधिक अपेक्षाएं रखी जाती हैं। शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चे वक्त से पहले परिपक्व हो रहे हैं। इसके फलस्वरूप वे अपने निर्णय स्वयं लेना चाहते हैं और अपने द्वारा लिए गए निर्णयों के अनुसार अपेक्षित परिणाम प्राप्त न होने पर आत्महत्या का निर्णय ले लेते हैं। आज परिवार अपने मौलिक स्वरूप से भटक कर आधुनिकतावाद की बलिवेदी पर होम हो रहे हैं। अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चे मशीन या रोबोट नहीं है। बच्चाें को बचपन से अच्छे संस्कार दिये जाने चाहिएं ताकि वे अपनी मंजिल खुद चुनें किन्तु आत्मविश्वास न खोएं। आज की शिक्षा बच्चो को डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर तो बना देती है परंतु वह चरित्रवान इंसान बने, इसकी उपेक्षा करती है। एक पक्षी को ऊंची उड़ान भरने के लिए दो सशक्त पंखों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दोनों प्रकार की शिक्षा अपने बच्चों को देनी होगी। सांसारिक शिक्षा उसे जीविका योग्य और आध्यात्मिक शिक्षा उसके जीवन को मूल्यवान बनाएगी। 

Thursday, 28 December 2017

कलेंडर बदलिए अपनी संस्कृति नहीं

नरेंद्र कुंडू 
जनवरी आने से पहले ही सब नववर्ष की बधाई देने लगते हैं। मानो कितना बड़ा पर्व हो। नया केवल एक दिन ही नहीं कुछ दिन तो नई अनुभूति होनी ही चाहिए। आखिर हमारा देश त्यौहारों का देश है। ईस्वी-संवत् का नया साल एक जनवरी को और भारतीय नववर्ष (विक्रमी संवत्) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। आइये देखते हैं दोनों का तुलनात्मक अंतर।
1- प्रकृति: एक जनवरी को कोई अंतर नहीं जैसा दिसंबर वैसी जनवरी। वहीं चैत्र मास में चारों तरफ फूल खिल  जाते हैं, पेड़ाें पर नए पत्ते आ जाते हैं। चारों तरफ हरियाली मानो प्रकृति नया साल मना रही हो।
2- मौसम, वस्त्र: दिसंबर व जनवरी में वही वस्त्र, कंबल, रजाई, ठिठुरते हाथ पैर लेकिन चैत्र मास में सर्दी जा रही होती है, गर्मी का आगमन होने जा रहा होता है।
3- विद्यालयों का नया सत्र: दिसंबर-जनवरी में वही कक्षा, कुछ नया नहीं। जबकि मार्च-अप्रैल में स्कूलाें का परिणाम आता है। नई कक्षा, नया सत्र यानि विद्यालयों में नया साल।
4- नया वित्तीय वर्ष: दिसंबर- जनवरी में कोई खातों की क्लोजिंग नहीं होती। जबकि 31 मार्च को बैंकों की क्लोजिंग होती है। नए बही खाते खोले जाते हैं। सरकार का भी नया सत्र शुरू होता है।
5- कलैंडर: जनवरी में नया कलैंडर आता है। चैत्र में नया पंचांग आता है। उसी से सभी भारतीय पर्व, विवाह और अन्य महूर्त देखे जाते हैं। इसके बिना हिंदू समाज जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता।
6- किसानों का नया साल: दिसंबर-जनवरी में खेतों में वही फसल होती है। जबकि मार्च-अप्रैल में फसल कटती है। नया अनाज घर में आता है तो किसानों का नया वर्ष और उत्साह होता है।
7- पर्व मनाने की विधि: 31 दिसंबर की रात नए साल के स्वागत के लिए लोग जमकर शराब पीते हैं, हंगामा करते हैं, रात को पी कर गाड़ी चलने से दुर्घटना की सम्भावना, रेप जैसी वारदात, पुलिस प्रशासन बेहाल और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विनाश। जबकि भारतीय नववर्ष व्रत से शुरू होता है। पहला नवरात्र होता है घर-घर में माता रानी की पूजा होती है। शुद्ध सात्विक वातावरण बनता है।
8- ऐतिहासिक महत्व: एक जनवरी का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है। जबकि चैत्र प्रतिपदा के दिन महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् की शुरुआत, भगवान झूलेलाल का जन्म, नवरात्रे प्रारम्भ, ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना इत्यादि का सम्बंध इस दिन से है। एक जनवरी को अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख और अंग्रेज मानसिकता के लोगों के अलावा कुछ नहीं बदला। अपना नव संवत् ही नया साल है। जब ब्रह्माण्ड से लेकर सूर्य-चांद की दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तियां, किसान की नई फसल, विद्यार्थियों की नई कक्षा, मनुष्य में नया रत्तफ़ संचरण आदि परिवर्तन होते हैं। जो विज्ञान आधारित हैं। इसलिए अपनी मानसिकता को बदलें। विज्ञान   आधारित भारतीय काल गणना को पहचानें। स्वयं सोचें की क्यों मनाये हम एक जनवरी को नया वर्ष?

‘प्राचीन भारत का विज्ञान’

नरेंद्र कुंडू 
आज पश्चिम जगत तरह-तरह से दंभ भरता है और नए-नए आविष्कारों को लेकर हर समय अपनी पीठ थपथपाता रहता है। आज पश्चिम को यह गर्व है कि लगभग सभी बड़े आविष्कार उन्हीं ने किये और कहीं ना कहीं बाकी दुनिया को वह हेय दृष्टि से देखते हैं। लेकिन क्या जिन आविष्कारों पर पश्चिमी देश और वैज्ञानिक अपना दावा ठोकते हैं, क्या उन पर वाकई उनका आधिपत्य माना जाना चाहिए? अगर हमारे देश का इतिहास और पौराणिक कथाएं देखें तो उनमें ऐसे बहुत से आविष्कार, यान, सूत्र, सारणी आदि का प्रयोग और उनका ज्ञान दिया गया है, जिसे सुन और पढ़कर आधुनिक विज्ञान भी दांतों तले उंगलियां दबा लेता है। पौराणिक कथाओं में वर्णित ऋषि-मुनि विज्ञान की खोज  पहले उन चमत्कारों को दर्शा चुके थे, जिन्हें विज्ञान अपना आविष्कार मानता है। फर्क बस इतना है कि पहले इन्हें चमत्कारों की श्रेणी में रखा जाता था और अब यह वैज्ञानिक करामात बन गए हैं। वैदिक काल के लोग खगोल विज्ञान का अच्छा ज्ञान रखते थे। वैदिक भारतीयों को 27 नक्षत्रें का ज्ञान था। वे वर्ष, महीनों और दिनों के रूप में समय के विभाजन से परिचित थे। वे अपने यज्ञ तथा अन्य धर्मिक अनुष्ठान ग्रहों की स्थिति के अनुसार शुभ लग्न देखकर किया करते थे। शुभ लग्न जानने के लिए उन्होंने खगोल विज्ञान का विकास किया था। वे सूर्य की उत्तरायण और दक्षिणायन गति से परिचित थे। महाभारत में भी खगोल विज्ञान से सम्बंधित जानकारी मिलती है। महाभारत में चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण की चर्चा है। इस काल के लोगों का ग्रहों के विषय में भी अच्छा ज्ञान था। परन्तु आज भारत की सबसे बड़ी बिड़म्बना यह है कि कुछ कुंठित बुद्धिजीवी इन्हें मात्र कहानी मानते हैं। यह बुद्धिजीवी तो इतने मानसिक रूप से गुलाम बन चुके हैं कि बिना कुछ सोचे-समझे और अध्ययन किये ही इन सबको काल्पनिक करार दे देते हैं। जबकि खुद अब्दुल कलाम ने कई बार कहा है कि उन्हें प्राचीन भारतीय ग्रंथों से मिसाइल बनाने की प्रेरणा मिली थी। अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कई बार प्राचीन भारतीय ग्रंथो की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। कुछ समय पूर्व हिस्टरी चैनल ने यह रहस्योघाटन किया था कि हिटलर प्राचीन भारतीय ग्रंथो पर अध्ययन कर ‘‘टाइम मशीन’’ बनाना चाहता था। यह एक अलग बात है कि किन्हीं कारणों से इनका श्रेय पाश्चात्य वैज्ञानिकों को मिला है। जबकि वास्तविकता यह है कि दुनिया को ज्ञान-विज्ञान भारत की ही देन है।  लेकिन चिंता इस बात की है आज हम अपनी विज्ञान आधारित संस्कृति को भूल कर पश्चिमी संस्कृति की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। पश्चिमी नव वर्ष पर तो हम एक माह पहले बधाइयों के संदेश भेजने शुरू कर देते हैं लेकिन अपने भारतीय नव वर्ष को भूल बैठे हैं। आज हमें अपना कैलेंडर बदलने की जरूरत है, संस्कृति बदलने की नहीं।

Tuesday, 5 December 2017

भारत की महान संस्कृति

नरेंद्र कुंडू 
                  किसी भी देश के विकास में उसकी संस्कृति का बहुत योगदान होता है। देश की संस्कृति, उसके मूल्य, लक्ष्य, प्रथाएं उसका प्रतिनिधित्व करते हैं। भारतीय संस्कृति कभी कठोर नहीं रही। इसलिए यह आधुनिक काल में भी गर्व के साथ जिंदा है। ‘अनेकता में एकता’ कोई शब्द नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चीज है जो भारत जैसे सांस्कृतिक और विरासत में समृद्ध देश पर पूरी तरह लागू होती है। कुछ आदर्श वाक्य या बयान, भारत के उस दर्जे को बयां नहीं कर सकते जो उसने विश्व के नक्शे पर अपनी रंगारंग और अनूठी संस्कृति से पाया है। मौर्य, चोल और मुगल काल और ब्रिटिश साम्राज्य के समय तक भारत हमेशा से अपनी परंपरा और आतिथ्य के लिए मशहूर रहा। रिश्तों में गर्माहट और उत्सवों में जोश के कारण यह देश विश्व में हमेशा अलग ही नजर आया। इस देश की उदारता और जिंदादिली ने बड़ी संख्या में सैलानियों को इस जीवंत संस्कृति की ओर आकर्षित किया, जिसमें धर्मों, त्योहारों, खान-पान, कला, शिल्प, नृत्य, संगीत और कई चीजों का मेल है। ‘देवताओं की इस धरती’ में संस्कृति, रिवाज और परंपरा से लेकर बहुत कुछ खास रहा है। ‘भारतीय जीवनशैली प्राकृतिक और असली जीवनशैली की दृष्टि देती है। भारतीय संस्कृति विशाल है व इसमें हर प्रकार के रंग और जीवंतता है। यह देश कई सदियों से सहिष्णुता, सहयोग व अहिंसा का जीवंत उदाहरण रहा है और आज भी है। इसके विभिन्न रंग इसकी विभिन्न विचारधाराओं में मिलते हैं। भारत का इतिहास भाईचारे व सहयोग के उदाहरणों से भरा पड़ा है। इतिहास में अलग-अलग समय में विदेशी हमलावरों के कई वार झेलने के बाद भी इसकी संस्कृति व एकता कभी नहीं हारी और हमेशा कायम रही। समय के साथ चलते रहना भारतीय संस्कृति की सबसे अनूठी बात है। यहां सड़क किनारे शो से लेकर थियेटर में एक अत्यंत प्रबुद्ध नाटक तक सबकुछ कलात्मक है। भारतीय संस्कृति सम्पूर्ण मानव समुदाय के विकास क्रम की सम्यक चेष्टाओं का भंडार है और इसीलिए इसे किसी सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। भारतीय संस्कृति की अपनी विशेषताएं हैं, अपना इतिहास है और अपनी गाथा है। साहित्यकार, कलाकार व कलमकार (पत्रकार) अपनी कला के माधयम से युवा पीढ़ी को भारत की महान संस्कृति के दर्शन करवा कर राष्ट्रहित में अपना योगदान दे सकते हैं।   



Tuesday, 22 August 2017

'कीट ज्ञान की पाठशाला में एक दिन के विद्यार्थी बनेंगे भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी'

जहरमुक्त खेती के मॉडल को देखने के लिए सितंबर में निडाना आएंगे वरिष्ठ नेता जोशीकार्यक्रम में हरियाणा के अलावा पंजाब के किसान भी होंगे शामिल
कार्यक्रम की तैयारियों को लेकर बनाई रणनीति

नरेंद्र कुंडू 
जींद। थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए जींद जिले से शुरू हुई कीट ज्ञान की मुहिम को बारिकी से समझने के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी किसान खेत पाठशाला में एक दिन के विद्यार्थी बनेंगे। मुरली मनोहर जोशी सितंबर माह में जींद जिले के निडाना गांव का दौरा करेंगे। इसको लेकर कीटाचार्य किसानों ने कार्यक्रम की रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है। कार्यक्रम की तैयारियों को लेकर सोमवार को शहर की अर्बन एस्टेट कॉलोनी स्थित जाट धर्मशाला में कीटाचार्य किसानों की एक बैठक हुई। इस बैठक में हरियाणा के अलावा पंजाब के किसानों ने भी भाग लिया। बैठक के दौरान रणनीति तैयार की गई कि भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी को बंद कमरे में मुहिम की जानकारी देने की बजाए खेतों में चल रही पाठशाला में ही मांसाहारी व शाकाहारी कीटों की पहचान करवाएंगे। इसके अलावा कीट ज्ञान की मुहिम को दूसरे प्रदेशों के किसानों तक पहुंचाने के लिए भी कीटाचार्य किसानों ने विचार-विमर्श किया।
गौरतलब है कि फसलों में कीटनाशकों के प्रयोग को कम कर खाने की थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए जींद जिले के निडाना गांव में वर्ष २००८ में डॉ. सुरेंद्र दलाल ने किसान खेत पाठशाला की शुरूआत की थी। इस पाठशाला में किसानों को फसल में मौजूद मांसाहारी तथाा शाकाहारी कीटों की पहचान करव कर तथा उनके क्रियाकलापों की जानकारी देकर जागरूक किया जा रहा है। ताकि किसान फसल में मौजूद कीटों से भयभीत होकर फसल में किसी प्रकार के कीटनाशक का प्रयोग नहीं करंे। निडाना गांव से शुरू हुई कीट ज्ञान की इस मुहिम से किसानों को काफी सकारात्मक परिणाम मिले हैं। इससे किसानों का कीटनाशकों पर खर्च तो कम हुआ ही है साथ में पैदावार में भी बढ़ौतरी हुई। फसल में कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होने से किसानों को जहर से भी मुक्ति मिली। पिछले 9 वर्षों से चल रही यह मुहिम अब हरियाणा के साथ-साथ पंजाब में भी फैल चुकी है। कीट ज्ञान की इस मुहिम को सरकार तक पहुंचाने के लिए गत माह जींद जिले के कीटाचार्य किसान भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष नरेश सिरोह के नेतृत्व में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी से उनके आवास पर मिले थे। मुरली मनोहर जोशी ने कीटाचार्य किसानों से सितंबर माह में निडाना में आकर किसान खेत पाठशाला का दौरा करने का आश्वासन दिया था। कीटाचार्य किसानों ने सोमवार को जाट धर्मशाला में बैठकर कर भाजपा नेता के दौरे की तैयारियों को लेकर रणनीति बनाई है। बराह खाप के प्रधान कुलदीप ढांडा तथा कीटाचार्य किसान रणबीर मलिक ने बताया कि मुरली मनोहर जोशी के साथ वह निरंतर संपर्क में हैं और जल्द ही निडाना के उनके दौरे का दिन व समय भी निश्चित हो जाएगा। उन्होंने बताया कि सितंबर में होने वाले इस कार्यक्रम में हरियाणा के साथ-साथ पंजाब के किसान भी इसमें शामिल होंगे। बैठक में सर्वसम्मति से यह फैसला भी किया गया है कि यह कार्यक्रम किसी बंद कमरे में करने की बजाए खेत में चल रही किसान पाठशाला में किया जाएगा। पाठशाला में मुरली मनोहर जोशी को किसानों की कार्य पद्धति से रूबरू करवाया जाएगा। ताकि उनकी मार्फत जल्द से जल्द उनकी मांग सरकार तक पहुंच सके। 

दूसरे प्रदेशों में भी चलेंगी पाठशालाएं

कीटाचार्य रणबीर मलिक तथा सेवानिवृत्त जिला बागवानी अधिकारी डॉ. बलजीत भ्याण ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से जींद के अलावा हिसार, फतेहाबाद, बरवाला तथा पंजाब के लगभग 10 जिलों में उनकी किसान खेत पाठशालाएं चल रही हैं। उनकी पाठशालाओं से हजारों किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर कीटनाशकों का प्रयोग छोड़ चुके हैं। किसान खेत पाठशालाओं की बढ़ती मांग को देखते हुए अलग वर्ष हरियाणा व पंजाब के अलावा आस-पास के दूसरे प्रदेशों में भी किसान खेत पाठशालाएं चलाने की योजना तैयार की गई है।