फाइलों से बाहर नहीं आ रही जांच

सरकार के निर्मल भारत के सपने को लगा झटका

नरेंद्र कुंडू
जींद।
नियमों को ताक पर रखकर गंदगी से अटे पड़े गांवों को निर्मल गांव का दर्जा दिलवाने का मामला प्रशासनिक अधिकारियों के गले की फांस बन गया है। मामला उजागर होने के बाद स्वच्छता अभियान से जुड़े अधिकारियों में हड़कंप मच गया है और अधिकारी किसी न किसी तरह इस मामले पर पर्दा डालने की कोशिश में जुटे हैं। प्रशासनिक अधिकारी अब जांच का आश्वासन देकर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। मामला उजागर होने के तीन दिन बाद भी  जांच एक कदम आगे भी नहीं बढ़ पाई है। जांच के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई ही की जा रही है। प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही से केंद्र सरकार द्वारा भारत को निर्मल बनाने के सपने को तो करारा झटका लगा ही है, साथ-साथ सरकार द्वारा स्वच्छता अभियान पर खर्च किए जा रहे करोड़ों रुपए भी पानी में व्यर्थ बह गए हैं। ऐसे में स्वच्छता अभियान के नाम पर सरकारी बाबूओं का भी बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आ गया है। अधिकारियों द्वारा इस मामले पर जवाब देते नहीं बन रहा है।
सरकार देश को स्वच्छ बनाने का सपना संजोए हुए है। अपने इस सपने को साकार करने के लिए सरकार हर वर्ष अरबों रुपए खर्च कर रही है। इसके लिए सरकार द्वारा प्रदेश के प्रत्येक जिले में स्वच्छता अभियान चलाकर लोगों को जागरुक करने का काम किया जा रहा है। कागजों में अभियान की सफलता को देखते हुए सरकार आगामी दस वर्षों में पूरे भारत को निर्मल बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है। लेकिन अगर धरातल पर देखा जाए तो वास्तविकता कुछ ओर ही है। जिला स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इस अभियान की प्रगति रिपोर्ट केवल कागजों तक ही सीमित रहती है। अभियान को सफल बनाने के लिए अधिकारियों द्वारा फील्ड वर्क पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है। अधिकारियों की लापरवाही के कारण ही सरकार द्वारा अरबों रुपए खर्च करने के बावजूद भी वर्षों बाद भी स्वच्छता अभियान जमीन पर नहीं उतर पा रहा है। हाल ही में करनाल में आयोजित राज्यस्तरीय निर्मल पुरस्कार 2011 वितरण समारोह में भी फर्जी तरीके से ऐसे गांवों को निर्मल घोषित करवा दिया गया, जो गांव वास्तव में स्वच्छता अभियान से कोसों दूर हैं। इस समारोह में जींद जिले के आठ गांवों को निर्मल गांव घोषित किया गया है, जबकि इन गांवों में निर्मल गांव की एक भी  सुविधा नहीं हैं। इन गांवों में सभी परिवारों के पास न तो शौचालय हैं और न ही किसी भी गांव में अभी तक मैला ढोने की कूप्रथा समाप्त हुई है। इन गांवों में न तो पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था है और न ही किसी भी गांव से गंदगी पूर्ण रूप से खत्म हुई है। जिला प्रशासनिक अधिकारियों ने केवल अपनी इज्जत बचाने की फेर में इन गांवों को निर्मल गांव का दर्जा दिलवाया है। मामला उजागर होने के बाद अधिकारियों के गले की फांस बन गया है। अधिकारी जांच की आड़ लेकर मामले से बचने का प्रयत्न कर रहे हैं। लेकिन तीन दिन बाद भी जांच एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई है। इससे प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

किन-किन गांवों को मिला है निर्मल गांव का दर्जा

हाल ही में करनाल में आयोजित राज्यस्तरीय निर्मल पुरस्कार 2011 वितरण समारोह में जींद जिले से 8 गांवों को यह पुरस्कार दिया गया है। जिसमें जींद खंड में जीवनपुर, निडानी, रामगढ़, अलेवा खंड में बुलावाली खेड़ी, जुलाना में खेमाखेड़ी, नरवाना में रेवर, सफीदों में पाजू कलां तथा पिल्लूखेड़ा में भूरायण गांव को निर्मल गांव का दर्जा दिया गया है। लेकिन सरकार द्वारा घोषित किए गए ये आठों गांव वास्तव में निर्मल ग्राम पंचायत योजना के नियमों पर खरे नहीं उतर रहे हैं।

जांच के बाद आगामी कार्रवाई पर किया जाएगा अमल

मामला उनके नोटिस में आ चुका है। जल्द ही अपने कार्यालय के अधिकारियों की बैठक बुलाकर इस मामले पर गौर किया जाएगा। अधिकारियों को सर्वे के लिए दोबारा निर्देश दिए जाएंगे। जांच के बाद जो तथ्य सामने आएंगे उनके अनुसार आगामी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
अरविंद मल्हान
अतिरिक्त उपायुक्त, जींद

सर्वे टीम ने किया था गांवों का निरीक्षण

इस तरह के कार्यक्रम में सारा का सारा काम फील्ड से संबंधित होता है। अभियान की सफलता के लिए जिन टीमों का गठन किया जाता है वह टीमें गांव-गांव जाकर लोगों को जागरुक करती हैं। गांव में सफाई की जिम्मेदारी ग्रामीणों की होती है। ग्रामीणों को भी इस तरह के कार्यक्रमों में अपना सहयोग देना चाहिए। निर्मल पुरस्कार के लिए गांवों का चयन करने से पहले सर्वे टीम ने सभी गांवों का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट के अनुसार ही इन गांवों को पुरस्कार के लिए चुना गया था।
डा. युद्धवीर सिंह ख्यालिया
उपायुक्त, जींद

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