Sunday, 23 June 2013

कीटों को नियंत्रण करने में कीट ही सबसे बड़ा हथियार : डा. सैनी

कहा, प्रकृति ने सभी जीवों के लिए तय किए हैं नियम 
पाठशाला में किसानों ने कीटों का अवलोकन कर सीखे जहरमुक्त खेती के गुर

नरेंद्र कुंडू
जींद। कीट साक्षरता के अग्रदूत डा. सुरेंद्र दलाल द्वारा थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए जिले में शुरू की गई मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए शनिवार को कीट कमांडों किसानों तथा कृषि विभाग के सौजन्य से राजपुरा भैण गांव में किसान खेत पाठशाला का शुभारंभ किया गया। डा. सुरेंद्र दलाल के छोटे भाई विजय दलाल ने किसानों को कापी, पैन वितरित कर पाठशाला का शुभारंभ किया। कृषि विभाग के ए.डी.ओ. कमल सैनी तथा कीट मित्र किसान कमेटी के प्रधान रणबीर मलिक ने जहरमुक्त खेती की इस मुहिम को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। इस अवसर पर जिला बागवानी अधिकारी डा. बलजीत भ्याण, कृषि विभाग सफीदों उपमंडल के एस.डी.ओ. डा. सत्यवान आर्य, बराह तपा प्रधान कुलदीप ढांडा, चहल खाप के संरक्षक दलीप सिंह चहल, किसान क्लब के प्रधान राजबीर कटारिया विशेष रूप से मौजूद थे। 
डा. बलजीत भ्याण तथा डा. सत्यवान आर्य ने किसानों को सम्बोधित करते हुए कहा कि डा. सुरेंद्र दलाल की इस मुहिम को आगे बढ़ाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। बराह तपा के प्रधान कुलदीप ढांडा तथा चहल खाप के संरक्षक दलीप  सिंह चहल ने खापों की तरफ से किसानों को पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया। इसके बाद किसानों ने 5-5 किसानों के 6 ग्रुप बनाकर कपास की फसल में कीटों का अवलोकन किया। कीट अवलोकन के बाद कीट बही-खाता तैयार किया गया। किसान मनबीर रेढ़ू ने कहा कि फसल के उत्पादन में खेत में पौधों की पर्याप्त संख्या जरुरी है। रेढ़ू ने कहा कि एक एकड़ जमीन की लंबाई 220 तथा चौड़ाई 198 होती है। अगर किसान 3 बाई 3 की दूरी पर कपास के बीज की बिजाई करते हैं तो एक एकड़ में 73 लाइन बनेंगी और एक लाइन में 66 पौधे लगेंगे। इस प्रकार एक एकड़ में 4818 पौधे लगेंगे लेकिन उन्होंने पाठशाला के दौरान जिस खेत का अवलोकन किया है उस खेत में 4355 पौधे हैं और प्रत्येक पौधे पर औसतन 10 पत्ते हैं। इस पूरी फसल में कुल 43550 पत्ते हैं। पाठशाला में मौजूद किसानों द्वारा फसल के निरीक्षण के बाद तैयार किए गए बही खाते के आंकड़े के अनुसार पूरे खेत में कुल 46 हजार की संख्या में सफेद मक्खी और 46 हजार की संख्या में ही हरातेला तथा 60 हजार की संख्या में चूरड़ा फसल में मौजूद हैं। रेढ़ू ने बताया कि इसके अलावा इन कीटों को खाने वाले मांसाहारी कीट भी पूरी तादात में खेत में मौजूद हैं। 
 चार्ट पर कीटों का बही खाता तैयार करते किसान।
कपास के इस खेत में क्राइसोपा, क्राइसोपा के बच्चे, मकड़ी, बिंदुआ बुगड़ा तथा कातिल बुगड़ा भी मौजूद हैं। एक क्राइसोपा तथा एक बिंदुआ बुगड़ा एक दिन में 250-250 के करीब सफेद मक्खी, चूरड़े तथा हरेतेले का काम तमाम कर देते हैं और मकड़ी की खुराक तो इन सबसे ज्यादा है। इसलिए किसानों को फसल में मौजूद शाकाहारी कीटों से डरने की जरुरत नहीं है। किसान चतर  सिंह ने बताया कि कीट बही खाते के आंकड़ों के अनुसार इस खेत में प्रति पौधा 1.1 सफेद मक्खी, 1.1 हरातेला तथा 1.4 चूराड़ा की औसत आई है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अगर कपास की फसल में प्रति पौधा सफेद मक्खी की औसत 6, हरेतेले की औसत 2 तथा चूरड़े की औसत 10 प्रति पत्ता हो तो ही ये शाकाहारी कीट फसल में नुक्सान पहुंचाने के सत्र पर होते हैं लेकिन आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो अभी तक ये कीट हमारी फसल में नुक्सान पहुंचाने के सत्र से कोसों दूर हैं। डा. कमल सैनी ने कहा कि कीटों का आपसी तालमेल काफी अच्छा होता है। कपास की इस फसल में सूरा नामक कीट काफी तादात में मौजूद है। जबकि सूरा कीट सरसों की फसल का कीड़ा है लेकिन अब यह कीड़ा कपास की फसल में भी मौजूद है। सैनी ने बताया कि सूरा कीट के साथ-साथ उसका शिकारी कातिल बुगड़ा नामक मांसाहारी कीट भी काफी मात्रा में मौजूद है। इसलिए किसानों को इस कीट से भयभीत होने की जरुरत नहीं है। क्योंकि कीट को नियंत्रण करने में कीट ही सबसे बड़ा हथियार होता है और प्रकृति ने पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवों के लिए नियम तय किए हैं। इस अवसर पर पाठशाला में राजपुरा भैण, ईंटल,  सिंसर, छापड़ा, ईगराह, निडानी, निडाना, ललीतखेड़ा, रधाना, चाबरी, सिरसाखेड़ी गांवों से लगभग 50 किसान पाठशाला में मौजूद थे। 

पाठशाला के शुभारंभ अवसर पर किसानों को कापी, पैन देते विजय दलाल तथा फसल पर कीटों का अवलोकन करते किसान। 



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