Wednesday, 10 July 2013

जहरमुक्त खेती की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कृषि विभाग ने किसानों की तरफ बढ़ाया हाथ

रधाना में महिला तथा निडानी में पुरुष किसानों की खेत पाठशालाएं शुरू 

नरेंद्र कुंडू 
जींद। कीट साक्षरता के अग्रदूत डा. सुरेंद्र दलाल द्वारा थाली को जहरमुक्त करने के लिए जींद जिले में शुरू की गई कीट ज्ञान की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए अब कृषि विभाग ने भी जिले के किसानों की तरफ हाथ बढ़ाया है। जिले के किसानों को कीटों की पहचान करवाकर जहरमुक्त खेती की तरफ आकर्षित करने के लिए कृषि विभाग द्वारा भारत सरकार की मिनी टैक्रोलोजी मिशन-2 योजना के तहत बुधवार को जिले के रधाना गांव में महिला किसान खेत पाठशाला तथा निडानी गांव में पुरुष किसान खेत पाठशाला का शुभारंभ किया गया। डा. सुरेंद्र दलाल की पत्नी कुसुम दलाल ने महिला तथा पुरुष किसानों को राइटिंग पैड, पैन तथा सुक्ष्मदर्शी लैंस देकर पाठशाला का शुभारंभ किया। इस अवसर पर पाठशाला में कृषि विभाग के जिला उप-निदेशक डा. रामप्रताप सिहाग भी विशेष रूप से मौजूद थे। 
 किसानों को राइटिंग पैड तथा पैन वितरित करती कुसुम दलाल।
 फसल में कीटों का अवलोकन करती महिला किसान।
मैडम कुसुम दलाल ने कहा कि डा. सुरेंद्र दलाल ने जिले के किसानों के साथ मिलकर जहरमुक्त खेती की जो मुहिम शुरू की है, उसे आगे बढ़ाने के लिए उनका परिवार हर वक्त किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा। कृषि उप-निदेशक डा. राम प्रताप सिहाग ने किसानों को मिनी टैक्रोलोजी मिशन के बारे में जानकारी देते हुए महिला तथा पुरुष किसानों को कीटों की पहचान करने तथा उनके क्रियाकलापों को समझने के लिए प्रेरित किया। डा. सिहाग ने कहा कि डा. सुरेंद्र दलाल तथा जींद के किसानों द्वारा कीटों पर जो शोध किए गए हैं, अब वैज्ञानिक ने भी किसानों के इस शोध पर अपनी सहमती की मोहर लगा दी है। उन्होंने कहा कि कीटों को न तो नियंत्रित करने की जरुरत है और न ही इन्हें मारने की। अगर जरुरत है तो इन्हें पहचानकर इनके क्रियाकलापों के बारे में ज्ञान हासिल करने की। डा. सिहाग ने कहा कि कपास की फसल में आने वाले जिस मिलीबग नामक कीट का नाम सुनकर बड़े-बड़े किसानों के पसीने छूटने लगते थे, उस मिलीबग को तो यहां के किसानों से आल-गोल कीट साबित कर दिया है। मिलीबग को कंट्रोल करने के लिए किसी कीटनाशी की जरुत नहीं पड़ती। इसे काबू करने के लिए तो कपास की फसल में अंगीरा, जंगीरा तथा फंगिरा नामक कूदरती कीटनाशी काफी संख्या में मौजूद होते हैं। इसके अलावा कपास की फसल में आने वाली सफेद मक्खी, हरा तेला तथा चूरड़े नामक शाकाहारी कीट से भी फिलहाल कपास की फसल को कोई खतरा नहीं है। यहां के किसानों ने सफेद मक्खी, चूरड़ा तथा हरेतेले का जो सर्वेक्षण किया है उसके आधार पर यह कीट अभी तक नुक्सान पहुंचाने के स्तर से काफी दूर हैं। जिला पौध संरक्षण अधिकारी अनिल कुमार व कृषि विकास अधिकारी डा. कमल सैनी ने बताया कि वैज्ञानिक भी यही मानते हैं कि सफेद मक्खी की संख्या यदि प्रति पौधा 6 से अधिक है, हरे तेले की संख्या प्रति पौधा 2 तथा चूरड़े की संख्या प्रति पौधा 10 से अधिक आती है तो ही यह कीट फसल में कुछ नुक्सान पहुंचा सकते हैं लेकिन अभी तक इनका आंकड़ा इस स्तर से काफी नीचे है। इसलिए किसानों को इन कीटों से भयभीत होने 
 पाठशाला में कीटों का बही खाता तैयार करती महिला किसान। 
की जरुरत नहीं है। इस अवसर पर उनके साथ कृषि विभाग से एस.एम.एस. युद्धवीर सिवाच, ए.डी.ओ. रवि कादियान, राजेंद्र शर्मा, सनुील दलाल तथा डा. सुरेंद्र दलाल के पुत्र अक्षत दलाल भी विशेष रूप से मौजूद थे। 

फसल के उत्पादन में पौधों की संख्या का योगदान 

निडानी के किसानों ने हवन कर पाठशाला का शुभारंभ किया। इसके बाद जिस खेत में पाठशाला का शुभारांभ किया उस खेत में मौजूद कपास की फसल के पौधों की गिनती की। डा. कमल सैनी ने बताया कि किसी भी फसल के उत्पादन में पौधों की संख्या का सीधा-सीधा योगदान होता है। यहां के किसानों ने जिस खेती के पौधों की गिनती की है, उस खेत में कुल 4436 पौधे हैं, जो की फसल के अच्छे उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं। 





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