Saturday, 3 August 2013

किसानों ने तोड़ी मरोडिय़े की मरोड़

किसान कीट ज्ञान की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए बनाएं डाक्यूमैंट्री  : डा. सांगवान

नरेंद्र कुंडू
जींद। शनिवार को गांव राजपुरा भैण में आयोजित डा. सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता किसान खेत पाठशाला में किसानों ने कृषि विशेषज्ञों के साथ मरोडिय़े की बीमारी पर गहन मंथन किया। इस अवसर पर कृषि विश्वविद्यालय हिसार से काटन विभाग के मुखिया डा. आर.एस. सांगवान, काटन वैज्ञानिक डा. उमेंद्र सांगवान तथा कीट वैज्ञानिक डा. कृष्णा भी भाग लेने के लिए पहुंचे थे। कृषि विश्वविद्यालय हिसार से आए डा. आर.एस. सांगवान ने कहा कि किसानों ने कीटों पर जो शोध किया है, वह वास्तव में काबिले तारीफ है। किसानों को इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कीटों पर एक डाक्यूमैंट्री बनानी चाहिए, ताकि अधिक से अधिक किसानों को इस मुहिम से जोड़ा जा सके।
किसानों के साथ कपास की फसल में कीटों का अवलोकन करते कृषि अधिकारी।
कृषि विकास अधिकारी डा. कमल सैनी ने कहा कि मरोडिया एक लाइलाज बीमारी है। यह जैमनी वायरस है और इस वायरस को खत्म करने के लिए आज तक कोई भी दवाई नहीं बनी है। क्योंकि यह वायरस न तो जीवित है और न ही मृत। अगर  किसी वस्तु या पौधे में इसका प्रवेश करवा दिया जाता है तो यह जीवित हो जाता है और अगर इसे बाहर निकाल दिया जाता है तो यह मृत अवस्था में चला जाता है। इस लिए इसका इलाज संभव नहीं है। मरोडिये के लक्षण दिखाने में पौधे को 30-40 दिन लग जाते हैं। डा. सैनी ने कहा कि इस वायर को फैलाने में सफेद मक्खी एक वाहक का काम करती है। सफेद मक्खी जब वायरस युक्त पौधे का रस चूसकर दूसरे पौधे पर जाकर रस चूसती है तो सफेद मक्खी के डंक के माध्यम से यह स्वस्थ पौधे में प्रेवश कर जाता है। अगर खेत में एक सफेद मक्खी भी है तो वह भी पूरे खेत में इस वायरस को फैला सकती है। इसलिए किसानों को कीटनाशकों में इसका विकल्प ढूंढऩे की बजाए पौधे की ताकत को बनाए रखने पर जोर देना चाहिए। क्योंकि यह वायरस पौधे से कार्बोहाइड्रेट को कम करता है। डा. सैनी ने बताया कि कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो किसानों को एक एकड़ में लगाए गए कपास के पौधे को ताकत देने के लिए 100 लीटर पानी में आधा किलो जिंक, अढ़ाई किलो डी.ए.पी. तथा अढ़ाई किलो यूरिया का घोल तैयार कर उसका छिड़काव करना चाहिए। मरोडिया के कारण पौधों में जो कार्बोहाइड्रेट की कमी होगी, वह कमी यह घोल पूरी करता रहेगा। डा. सैनी ने कहा कि कीट साक्षरता की मुहिम से जुड़े किसानों ने इसी तहर सीमित मात्रा में उर्वरकों का यह घोल तैयार कर इस मरोडिये की मरोड़ निकाली है।
एच.ए.यू.  हिसार से आए डा. आर.एस. सांगवान को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित करते किसान।

किसान कीड़ों के साथ न करें छेडख़ानी 

किसान खेत पाठशाला में भाग लेने आए मास्टर ट्रेनर किसान रणबीर मलिक, मनबीर रेढ़ू, रामदेवा, बलवान, जोगेंद्र अलेवा, जयभगवान ने कहा कि किसानों को कीटों को कंट्रोल करने के लिए किसी कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। कीटनाशकों के इस्तेमाल से कीटों की संख्या कम होने की बजाए बढ़ती है। मास्टर ट्रेनर किसानों ने बताया कि निडाना, निडानी, ललीतखेड़ा, राजपुरा भैण, ईंटल कलां, ईगराह आदि गांवों के किसान जो पिछले कई वर्षों से इस मुहिम के साथ जुड़े हुए हैं, उन्होंने अन्य वर्षों की भांति इस वर्ष भी अपनी फसलों में कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया है और उनके खेतों में सफेद मक्खी, हरे तेले और चूरड़े तथा अन्य शाकाहारी कीटों की संख्या कृषि वैज्ञानिकों द्वारा निर्धारित किए गए आॢथक कगार से अभी भी काफी दूर है। उन्होंने किसानों द्वारा की गई कीटों की साप्ताहिक कीट समीक्षा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सफेद मक्खी की संख्या 1.06, हरे तेले की 1.2 और चूरड़े की संख्या 1.4 तक पहुंची है, जो की नुक्सान के सत्र से कोसों दूर है।


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